वक्त का समंदर पार कर अाए उन अल्फाजों पर वो उँगलीया फेर रही थी.
''अब छोड भी दो उसे! तुम्हे तो कुछ भी अच्छा लगता है.'' उसने पास अाकर बैठते हुए कहाँ.
''मुझे तो तुम भी अच्छें लगे थे कॉलेजमे. पर तुम तो उस फिजिक्सवाली के पिछे थे. मुझे कहाँ से देखते?''
उसकी हात की चिठ्ठी को देखकर उसने कहाँ,
''ये कागज़ कितने पिले पड गये है ना?''
''वक्त का रंग पिला होता है हुजुर!''
वो मुस्कूराया. उसे खुश देखकर वो बोली,
''कितना प्यारा लिखा है तुमने!''
''पता नहीं... शायद! पर जिसेके लिए लिखा था उसने तो कभी...!"
वो उसकी अाँखो मे देख रही थी. उनमे शायद उसकी अधुरी बात पुरी होने का इंतजार था. वो जानकर वो बोल पडा.
"मनु, हर चिठ्ठी का इक सफर तै होता है. अंजाम चाहे जो भी हो, पर सफर की शुरुवात अौर अंत तो होता ही है ना! बुरा इस बात का लग रहा है के मेरी इस पहली अौर आखरी चिठ्ठी के नसीब मे वो कुछ भी नही.''
वो हस पडी.
''लोग इश्क मे अंधे होते है, तुम 'इश्क के' अंध हो!''
''मतलब?''
''तुमने चिठ्ठी लिखकर किताब में बंद कर दी. कल बीस सालों के बाद वो मुझे मिली. शायद तुमने वो मेरेही लिऐ लिखी हो! वैसे सोचा जाए तो चिठ्ठी सही पते पर पहुँच गई है. बस, अाने मे थोडी देर हो गई! कभी कभी सफर पुरे होने मे देर लगती है, पर वो पुरे जरूर होते है."
वो उसे अचरज से देखता रहा.
"अौर सच बताऊँ, तुमने जिस अंदाज से इसे लिखा है ना, मै तो फिरसे तुम्हारी कायल हो गई हुँ.''उसने आगे बढकर चिठ्ठी अपने हाथ मे ले ली. कागज पतला, नाजूक हो चुका था. वक्त ने चिठ्ठी को दिया हुवा वो नया रंग उसे बडा अच्छा लगा. तभी वो बोल पडी,
''अगर तुम वो फिजिक्स की किताब उस वक्त मुझे दे देते, तो शायद अपने ये पिछले पंद्रह साल कुछ अलग तरीके से गुजरते...''
''मतलब?''''मतलब ये जनाब! के अाप ये भूल चुके हो, के मेरा फेव्हरेट सब्जेक्ट फिजिक्स है.''
''अब छोड भी दो उसे! तुम्हे तो कुछ भी अच्छा लगता है.'' उसने पास अाकर बैठते हुए कहाँ.
''मुझे तो तुम भी अच्छें लगे थे कॉलेजमे. पर तुम तो उस फिजिक्सवाली के पिछे थे. मुझे कहाँ से देखते?''
उसकी हात की चिठ्ठी को देखकर उसने कहाँ,
''ये कागज़ कितने पिले पड गये है ना?''
''वक्त का रंग पिला होता है हुजुर!''
वो मुस्कूराया. उसे खुश देखकर वो बोली,
''कितना प्यारा लिखा है तुमने!''
''पता नहीं... शायद! पर जिसेके लिए लिखा था उसने तो कभी...!"
वो उसकी अाँखो मे देख रही थी. उनमे शायद उसकी अधुरी बात पुरी होने का इंतजार था. वो जानकर वो बोल पडा.
"मनु, हर चिठ्ठी का इक सफर तै होता है. अंजाम चाहे जो भी हो, पर सफर की शुरुवात अौर अंत तो होता ही है ना! बुरा इस बात का लग रहा है के मेरी इस पहली अौर आखरी चिठ्ठी के नसीब मे वो कुछ भी नही.''
वो हस पडी.
''लोग इश्क मे अंधे होते है, तुम 'इश्क के' अंध हो!''
''मतलब?''
''तुमने चिठ्ठी लिखकर किताब में बंद कर दी. कल बीस सालों के बाद वो मुझे मिली. शायद तुमने वो मेरेही लिऐ लिखी हो! वैसे सोचा जाए तो चिठ्ठी सही पते पर पहुँच गई है. बस, अाने मे थोडी देर हो गई! कभी कभी सफर पुरे होने मे देर लगती है, पर वो पुरे जरूर होते है."
वो उसे अचरज से देखता रहा.
"अौर सच बताऊँ, तुमने जिस अंदाज से इसे लिखा है ना, मै तो फिरसे तुम्हारी कायल हो गई हुँ.''उसने आगे बढकर चिठ्ठी अपने हाथ मे ले ली. कागज पतला, नाजूक हो चुका था. वक्त ने चिठ्ठी को दिया हुवा वो नया रंग उसे बडा अच्छा लगा. तभी वो बोल पडी,
''अगर तुम वो फिजिक्स की किताब उस वक्त मुझे दे देते, तो शायद अपने ये पिछले पंद्रह साल कुछ अलग तरीके से गुजरते...''
''मतलब?''''मतलब ये जनाब! के अाप ये भूल चुके हो, के मेरा फेव्हरेट सब्जेक्ट फिजिक्स है.''
No comments:
Post a Comment