Thursday, July 5, 2018

खानाबदोश

आंखों पर दस्तक हुई
पलके उठी
सामने देखा
तो बारीश का माहोल था

अर्श से छलके हुए
पैमाने की बूंदे
इस हाथ गिरी तो
दिल ये मदहोश था

बादल गरजे
बिजलीया चमकी
पर सारा जहाँ
खामोश था

सादगी भरे पानी मे फिर
मेरी रूह की कश्ती चली
मै ही मांझी मै ही नय्या
मुझ मे उसी का अक्स था

आंख बंद कर लांघ दी
सहमे मकानो की गली
बिते अरसे और आंखे खुली
तब मै खानाबदोश था...

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