पर बडे छुपे रुस्तम हो तुम
भेजते नहीं अपनी कहाँनिया
अपने आफसाने
मांगना पडता है...
या फिर अब भी ऐतबार नहीं के समझ पायेंगे हम उन्हे
---
शक तेरी समझदारी पे नही
मेरे तखय्युल पे है
अक्सर लगता है
जहाँ मै थम जाता हूँ, वहाँ तू शुरू होती है
भेजते नहीं अपनी कहाँनिया
अपने आफसाने
मांगना पडता है...
या फिर अब भी ऐतबार नहीं के समझ पायेंगे हम उन्हे
---
शक तेरी समझदारी पे नही
मेरे तखय्युल पे है
अक्सर लगता है
जहाँ मै थम जाता हूँ, वहाँ तू शुरू होती है
No comments:
Post a Comment