Monday, July 16, 2018

छाता

याद है,
हम बारीश मे दादर के सडकोंपर घंटो घुमा करते थे
दुनिया को भूलकर, छातो-रेनकोटों से मुँह मोड कर
खुद का जर्रा जर्रा भिगो लेना बडा अच्छा लगता था...
उस वक्त समझ में नहीं आता था,
के मुझे बारीश जादा प्यारी है या तुम?
फिर उस सवाल का जवाब भी मिल गया

बाय द वे, मेरी शादी हो चुकी है
दो महिनो पहले...
पहले त्योहार जैसी पहली बारीश आई है
अौर मैने कल ही नया छाता खरीद लिया है

Friday, July 13, 2018

भिजलेला गुलमोहर

''बाबाऽऽऽ.... ए बाबाऽऽऽ... उठ...''
सकाळी साडेसात वाजता वसू मला उठवायला अाली होती.
''बाबा उठ... पाऊस पडतो... माझा गुलमोहर भिजत्तो...''
शब्दांनिशी डोळे उघडले तर बाहर पाऊस धो धो कोसळत होता. अामच्या खिडकीतून दूरवर गुलमोहराचं झाडं उभं असलेलं दिसतं. वसू रोज खिडकी बसून अोव्याच्या झाडाची पानं खाते. तेव्हा त्या गुलमोहराकडे हात दाखवून म्हणत असते, ''माझं झाड हाय!''
अात्ता पावसात गुलमोहर भिजू लागला म्हणून तिने मला उठवलं. मी अाळसावलेल्या डोळ्यांनी तिच्या चेहऱ्यावरची इटुकली चिंता पाहत होतो. मी तिला विचारलं,
''अगं गुलमोहर भिजतो तर अापण काय करणार?''
तर दोन्ही हातांच्या मूठी जागच्या जागी गोल फिरवत म्हणाली,
''पिळून टाकू.''
अाता बोला!

अधुरा सा लगता है...

रूक जा, जरा ठहर जा
थोडी साँस तो लेने दे
तेरे तखय्युल से
ठिक से बात तो होने दे
ये जल्दी क्यों है तुझें?
मुझे पुरा करने की
ये दरकार क्यों पाली है तुने?
मुझे अंजाम देने की?
पता है नज़्म हूँ तेरी
अधुरी चुभती हूँ तुझे
पर जब तू मुझे पुरा करके
दुसरी नज़्मो के पास जाता है ना...
अल्फाजों की कसम,
बड़ा अधुरा अधुरा सा लगता है

पत्थर

अरसो पहले
किसी ने कहाँ था मुझसे
मै जरूर अाऊंगी
तुम राह देखना
तब से राह तके जा रहे है उनकी
न जाने कितना समय बित गया
अब तो नाम-पता भी भूल गये है खुद का
अाजकल तुम्हारी दुनिया के लोग मुझे
मिल का पत्थर कहकर पुकारा करते है

ठिकाना

कहते है टेक्नॉलॉजी के दौर ने
दुरीया मिटा दी है
गुगल मॅप से सारी दुनिया हथेली मे तो अा गयी
बस... उस दुनिया में कोई ठिकाना ना रहा

बददुअा

ए बेवफ़ा,
तुझे बददुअा देनो को बड़ा जी करता है
जा...
तू प्यार मे बेचैनी की मोहताज ना रहे!

बहाना

अमावस की रात मे
अंधेरे की अाड लिए
दबे पाँव निकल पडे
दिदार-ए-चाँद के
बाल्कनीके निचें से अावाज लगाई
तो व्हॉट्स अॅप पर संदेसा अा धमका
अाज रात छत पर ना अाने के लिए
चाँद को अमावस का बहाना मिल गया था

Thursday, July 12, 2018

समझ

''ये तुम्हारी पेंटींग्स मुझे समझ मे नहीं अाती.''
''क्यों? क्या मै तुम्हारी कविताअों के बारे में कभी ऐसा कहता हूँ?''
''तुम उन्हें समझते कहाँ हो? तुम तो मेरे अल्फाजोंको खुदके मतलब दे देते हो. ये समझना थोडेही ना हुअा?''
''सही कहाँ! इसे समझना नहीं, अपना बनाना कहते है.''
''ऐसे तोडमरोड के! ये तो मनमानी हुई!''
''खुदमे ढ़ा लेना कहो! बरसात का पानी प्याले मे गिरे तो प्याले जैसा, समंदर मे गिरे तो समंदर जैसा... छोडो रहने दो! तुम ठहरी अल्फाजोंकी ऊँची इमारतों मे रहनेवाली. तुम लिखावट के अागें की असली दुनियाँ को क्या समझोगी?''

जवाब

चिठ्ठीयाँ कहानियोंकी अागाज बन जाती है या फिर अंजाम फिरभी खुशनसीब होतें है वो लोग जिनकी चिठ्ठीयोंके जवाब अाया करते है

दुनिया

चिठ्ठीयों का मजा
तू क्या जाने ए शायरा!
लिखे हुए अल्फाजोंकी
दुनिया की कुछ अौर होती है!

वक्त का रंग

वक्त का समंदर पार कर अाए उन अल्फाजों पर वो उँगलीया फेर रही थी.
''अब छोड भी दो उसे! तुम्हे तो कुछ भी अच्छा लगता है.'' उसने पास अाकर बैठते हुए कहाँ.
''मुझे तो तुम भी अच्छें लगे थे कॉलेजमे. पर तुम तो उस फिजिक्सवाली के पिछे थे. मुझे कहाँ से देखते?''
उसकी हात की चिठ्ठी को देखकर उसने कहाँ,
''ये कागज़ कितने पिले पड गये है ना?''
''वक्त का रंग पिला होता है हुजुर!''
वो मुस्कूराया. उसे खुश देखकर वो बोली,
''कितना प्यारा लिखा है तुमने!''
''पता नहीं... शायद! पर जिसेके लिए लिखा था उसने तो कभी...!"
वो उसकी अाँखो मे देख रही थी. उनमे शायद उसकी अधुरी बात पुरी होने का इंतजार था. वो जानकर वो बोल पडा.
"मनु, हर चिठ्ठी का इक सफर तै होता है. अंजाम चाहे जो भी हो, पर सफर की शुरुवात अौर अंत तो होता ही है ना! बुरा इस बात का लग रहा है के मेरी इस पहली अौर आखरी चिठ्ठी के नसीब मे वो कुछ भी नही.''
वो हस पडी.
''लोग इश्क मे अंधे होते है, तुम 'इश्क के' अंध हो!''
''मतलब?''
''तुमने चिठ्ठी लिखकर किताब में बंद कर दी. कल बीस सालों के बाद वो मुझे मिली. शायद तुमने वो मेरेही लिऐ लिखी हो! वैसे सोचा जाए तो चिठ्ठी सही पते पर पहुँच गई है. बस, अाने मे थोडी देर हो गई! कभी कभी सफर पुरे होने मे देर लगती है, पर वो पुरे जरूर होते है."
वो उसे अचरज से देखता रहा.
"अौर सच बताऊँ, तुमने जिस अंदाज से इसे लिखा है ना, मै तो फिरसे तुम्हारी कायल हो गई हुँ.''उसने आगे बढकर चिठ्ठी अपने हाथ मे ले ली. कागज पतला, नाजूक हो चुका था. वक्त ने चिठ्ठी को दिया हुवा वो नया रंग उसे बडा अच्छा लगा. तभी वो बोल पडी,
''अगर तुम वो फिजिक्स की किताब उस वक्त मुझे दे देते, तो शायद अपने ये पिछले पंद्रह साल कुछ अलग तरीके से गुजरते...''
''मतलब?''''मतलब ये जनाब! के अाप ये भूल चुके हो, के मेरा फेव्हरेट सब्जेक्ट फिजिक्स है.''

पन्ने

वो किताबों से लदी उन अलमारीयों के बिच खड़ा था. वो पिछें से अाई.
''चलो! ढूँढ़ना है ना? परमीशन सिर्फ दो घंटे के लिए मिली है.''
दोनो ढूँढ़ने लगे. उसके कॉलेज के जमाने की प्रेमकहाँनिया सुनना उसे बड़ा अच्छा लगता. एक दिन जब उसने कहाँ, के बीस साल पहले फिजिक्स की इक किताब में रखी चिठ्ठी कभी पहुँची ही नहीं, तो उससे रहा ना गया. वो उसे खिंच के कॉलेज की लायब्ररी मे ले अाई. उसे देखनी थी वो चिठ्ठी. पर वो इतना इंटरेस्टेड नहीं था.
''अरे क्या कर हो? ढूँढ़ो ना!''
''रहने दो ना मनु!''
''क्यों?''
''मुझे लगता है चिठ्ठी नहीं मिलेगी. पिछले बीस सालों मे किसी पढ़नेवाले से गीर गई होगी कहीं, या फिर ले गया होगा कोई...''
''अरे ढूँढ़ो ना तुम! शायद होगी अभी भी वहीं...'' उसने इक किताब को रॅक से उतारते हुए कहाँ.
''दरसल मै नहीं चाहता की वो चिठ्ठी मिलें. अगर वो चिठ्ठी मिल गई तो...''
''तो क्या?''
''बीस साल से उस चिठ्ठी को किसी ने ना पढ़ा... सोचो, कितनी अकेली होगी वो? मुझे उसे देख कर बड़ा बुरा लगेगा मनु!''
''अकेली कहाँ? दो पन्ने भी तो होंगे ना उसके साथ! अब तक तो वो भी रंग बदलकर गुलाबी पड गए होंगे.'' वो हंसकर बोली. उसने सफेद पडते हुए बालों की लट को कान के पिछें सरकाया अौर वो किताब ढूँढ़ने लगी. वो भी उसके साथ हो लिया...
पन्ना तो उसने भाँप लिया था. शायद चिठ्ठी भी...

Physics

वो दिल्ली की कॉन्फरन्स में मिले! बीस सालों के बाद...
दोनो लंच के बाद गार्डन मे बैठे थे. उसने पुछाँ. ''तू मुझें तब लाईक करता था क्या?''
उसने अचरज भरी निगाहोंसे उस देखाँ.
उस सवाल के साथ उसके सामने खड़ी बीस साल की पहेली बुझ गई थी.
तब उसने फिजिक्स की किताब मे छुपाकर उसे लव्हलेटर भेजा था. उसका कभी जवाब नहीं अाया. अब उसे एहसास हुअा के उसने वो खत पढ़ा ही नहीं था.
वो भूल गया था की She hates physics!

ड्रॉप

कंधे की बॅग अॅडजस्ट करते हुए उसने अॉफिस की लिफ्ट का बटन दबाया. कुछ देर मे जुहु के टॅप रेस्टों मे सतीश वर्मा की पार्टी थी. 'जाने में कम से कम अाधा घंटा!' उसने मन ही मन मे ट्रॉफिक का कॅल्क्युलेशन करते हुए लिफ्ट मे कदम रखा.
''समीर...!''
नये मार्केटींग मॅनेजर की अावाज अाई. उसने तपाक से दरवाजे पर हात रख दिया. वो साडी को संभालते हुए अंदर अा गई. लिफ्ट निंचे जाने लगी.
'साली साड़ी मे गहजब लगती है. कॉन्फरन्स रूम मे मॉर्निंग मिटिंग मे ये जब हाँथ मे मार्कर लिए बात करती है तो जी चाहता है के खा जाऊँ इसे बस! अगर ये इतनी खडूस मिजाज की ना होती ना तो...''
''Can you drop me till my home? My car broke down.''
''अ... Where exactly?''
''Kandiwali, Thakur village!''
मतलब उलटी दिशा मे? इस वक्त? ट्रॅफिक, मेट्रो का चलता काम, मुंबई की बारीश... उसके अाँखो के सामने से छोटासा स्लाईडशो चल गया! वो उसके जवाब के इंतजार मे उसे देख रही थी.
''Yes Yes... Sure Madam!'' वो उसके कजरारे नैनो को देख हडबडाकर बोला.
'हाय ये नज़र...'' वो निचे देख के बुदबुदाया.
वो पिछेले सीट पर बैठी. गाडी गड्डे अौर ट्रॅफिक मे उटपटांग टर्न लेती हुई उसकी बाईक अागे बढ़ने लगी.
''यहाँ से नहीं, यहाँ से लेना.'' वो पिछे से बता रहीं थी.
'अब यहाँ भी मॉनेटरींग करेगी क्या?' उसके माथा फिर गया.
बारीश शुरू हुई. शर्ट भीगी. तब उसे पता चला की उसका हाँथ उसके कंधे को पकडे हुए है. पतली भिगी शर्ट मानो गायब हो चुकी हो. उसे थंड लगने लगी.
''Mam, कहीं रूके?''
''नही.''
'साली, थोडी मेरी भी तो फिक्र कर!'
गाडी मिलेनियम टॉवर के निचे रूकी तब दोनो अच्छे खाँसे भीग चुके थे. बारीश रूकने का नाम ना ले रही थी.
''Thank you.''
उसने स्माईल देकर किक मारी.
''Wanna have coffee? तुम्हारे कपडे...''
''No No! Thanks for the offer. But I need to reach somewhere.''
''Are you sure? The rain is quite heavy. You can wait for a while.'' कजरारे नैन बोल पड़े.
''.... No... Really.... Thanks again.'' उसके लफ्जों मे हिचकिचाहट थी.

वो टॅप रेस्टों पहुँचा तब तक शर्मा पुरा टुन हो चुका था.
''अबे चुतिये! ये अाने का टाईम है क्या?'' रीटाने पुँछा.
''तेरी वो खडूस बॉस रागिनी मिल गई यार! उसे कांदिवली तक छोड़ना पडा!''
''अब इस फेवर के बदले प्रमोशन मिलेगी तुझे.'' रीटाने गिलास मूँह को लगाते कहाँ.
''वो क्या प्रमोशन देगी? मुझे कॉफी पे निपटा रही थी. मख्खीचूस!"
''Coffee? Strange! She hates coffee!'' रीटा चली गई.
इक पल के लिए उसकी अाँखे चमकी. उसने गाडी की चाबी उठाकर बाहर दौड लगाई...

सीट

परेल का एस.टी. स्टेशन धुँअाधार बारीश मे धुँदला दिखाई दे रहा था.
वो रिझर्व्ह की हुई विंडो सीटपर बैठ गया. बारीश का जोर बढ़ा तो सारी खिडकीयाँ बंद होने लगी. उसने खिडकी की चिटखनी बंद करने से पहले बाहर देखा. वो उलटा होता हुअा छाता अौर कंधे की बॅग संभालते हुए बस की तरफ अा रही थी. खिडकी खुली ही रहीं.
उसने बसमें कदम रखा. बस की सारी सींटे भर चुकी थी! इक उसके बगलकी छोड के...
वो उसके पास अाँके बैठी. 
'क्या किस्मत इतनी भी मेहरबान होती है क्या?' उसका मन बोल पड़ा.
''सुनीए.'' वो अल्फाज उसके कानो में शहद की तरह उतरते गये.
''हां जी?''
''अगर अापको ऐतराज ना हो तो क्या हम सीट एक्सचेंज कर सकते है?''
उसको क्या ऐतराज होना था? सींटे बदली. उसने उसकी बॅग उठाकर उपर रख दी. तभी...
''सुनिए, अाप मेरी सीट पर बैठे है.'' वो पच्चीस साल का नौजवान था.
''क्या?''
''यहा मेरी रिझर्व्हेशन है.''
उसने सीट छोडी. नौजवान बैठ गया. ये देख वो उठते हुए बोली,
''अरे मेरी वजह से अाप की सींट...'' उसके अाँखो मे बड़ी सादगी थी.
''अरे बैठीये.'' उसने मुस्कुराते हुए कहाँ. वो बैठ गयी. वो वहीं बगल में खडा रहा. उसने बैठे बैठे तिरछी नज़र से उसे देखा. उन होठोंपर हलकी प्यारी मुस्कान थी. उसने तै कर लिया. अब मंजिल अाने तक यहीं टिके खड़े रहना है.
तभी फोन बजा. ''हा जानू. अच्छी सीट मिली है.'' साथ मे हसीं की चुभती किलकारी.
वो मूडा अौर सीधे जाकर ड्राईव्हर की केबिन मे घुस गया.

बहाना

''ये क्या हर वक्त गुस्सा करते रहते हो?''
''हा! तुम देर अाअो अौर मै गुस्सा भी ना करू?''
''अरे भाई, पाँच मिनट की ही तो देरी हुई है. मुंबई की ट्रॅफिक में उतनी भी छुंट नही दोगे क्या?''
''जाअो मुझसे बांत ना करो. अौर हा! ये मुझे भाई कहना बंद करो. अच्छा नहीं लगता मुझे.''
''तो क्या सय्या कहूँ?''
''...''
''जानती हूँ तुम्हारे दिल में क्या है! ये झगड़ो के बहाने बड़े पुराने है. यार! कुछ नया तो कर लेते! अच्छा लगता मुझे.''
''तो क्या तुम्हारे दिल में भी...''
''नहीं. तुम दोस्त ही ठिक हो.''

कारवाँ

हम जो लिखते है उसे शायरी कहते है
ये मालूम न था...
हम तो बस अल्फाजोंसे अल्फाज जोडते गये
और कारवाँ बनत गया...

Wednesday, July 11, 2018

उखाणा

ओठी तुझ्या उखाणा
अन् घालमेल या जीवाची
वळसा तुझा माझ्या नावाला
अन् निःश्‍वास दुःखाचा या उराशी

नज्म अौर शायरी

बारीश अाई
मै कलम लेकर निकल पड़ा

हरी-भीगी वादियाँ
बागों के फूल
गिली रेत के साहिल
पानी में उछलते-कुदते बच्चे
कहाँ कहाँ नहीं गया!
क्या क्या नहीं देखाँ!
बारीश को खुदमे समाएँ
गिला मन अौर गिली कलम लिए
घर अा पहुँचा

काग़ज सामने था
अौर हाँथ मे कलम तय्यार
तभी बिवीने हाँथ मे घडा थमा दिया, कहाँ..
''बडे अाये शायर... बाहर से भीग कर अाते हो,
यहाँ घर मे एक बूँद पानी नही है, उसकी फिक्र है?
जाअो! ले अाअो!''
मैने कलम छोडी
घडा उठा लिया

चाली के नल पर
बिवीयोंने भेजे हुए शौहरोंका ये शोर था
मन मे चली खयालो की नय्या
घडे मे गिरते पानी मे डुबने लगी
सारी अौरते दरवाजे-खिडकीयों से चिल्लाती
शौहरों की डोर खिंच रही थी
मेरे दिल की नज्म
उस भीड मे खोने लगी
तभी सारा अालम खामोंश हो गया
बिवी कॅरोडोर मे अाई थी
बोली,
''उपर अाईये! एक घडा बस हुअा! चाय तय्यार है!''
सारे उदास घडे मुझे जलनभरी नजरोंसे देखने लगे

घर अाया तो बेटी अलमारी से
अल्फाबेट्स के खिलौने निकाल रही थी
किचन मे कुछ खडखडाहट हुई
अौर मेरी जिंदगी की पहली नज्म
हात मे चाय का कप लिये मेरे सामने अाई
उसके पिठपर झुलती अल्फाजों की एक लडी
मैने हाँथ मे पकडकर खेंच दी
रुख्सार का रंग लाल हो चुका था
हम दोनो एक प्लेट मे चाय पिने लगे
सामने हम दोनो ने लिखी हुई इक नन्ही शायरी
अल्फाजोंको समेटनेकी कोशिश कर रही थी...

एक पन्ने की चिठ्ठी

एक पन्ने की चिठ्ठी लिखने बैठा
सोचा! एक ये बात अौर दो वो बातें लिखकर पुरी कर दूँगा
लिखना शुरू करते ही दो पन्ने भर गए
जो बातें कहनी थी उनके बिच
दिमाग अपनी कहानियाँ पिरोने लगा
चिठ्ठी थोडी लंबी होती चली गई
फिर दिल कूद पडा
यहाँ वहाँ की बातें करने लगा
चिठ्ठी अौर लंबी होती चली गयी
लिखते हाँथ चिड गये दिलपर
''ए बिनबुलाए मेहमान! दस पन्ने हो गए! देख तो सही!''
पर दिल खुदकी मनमानी करने पर तुला हुअा था
उसके कदम जगह जगह पडते गयें
कुछ पुराने अनुभव थे
कुछ अच्छी-बुरी याँदे थी
कुछ कल्पनाऐं
तो कुछ गहरी उभरी सोच...

कई पन्ने बिते...
लगता है चिठ्ठी की डायरी बन चुकी है
बस अब लिखना अच्छा लगता है
वो पुरी करके किसीको भेजने का खयाँल
पहले कुछ पन्नो कि निचें दब कर
नजरअंदाज हो चुका है

इश्क मे अजनबी...

स्टेशनपर उसकी राह तकते तकते वो परेशान हुवा था. लोकलके टिकट कतार से बचने के लिये उसे ऍप से टिकट भी बुक करा दी थी, फिर भी पता नहीं वो देर क्यो कर रही थी? उपर से उसके पेट के चुहे बाहर निकलने तडफ रहे थे. आखीर वो आ गयी. चर्चगेट से दादर आते आते उसने दोपहर के साडे तीन बजा दिये थे. फिर उन्हे इकठ्ठे चार बजे एक मिटींग भी पोहचना था और दोनों को ही अपने पेट के चुहों का खयाल करना था.
दादर स्टेशन बाहर के हाटेल में दोनो बैठ गये.
वेटर ने ऑर्डर पुछा.
''जल्दी क्या मिलेगा... ठीक है तो पाव भाजी लेलो. तुम क्या खाओगी?''
"जल्दी में तो पाव भाजी के अलावा उडदवडा सांबार ही नजर आ रहा है, वो ही ला दो भाई."
वेटरने अॉर्डर टेबल पर लगा दी.
"और एक कोक भी लेना." उसने जैसे ही ये कहा लडकीने चौंक कर देखा.
जैसे वो नॉनव्हेज हो और लडकेने कोई घासफुस की ऑर्डर दी. फिर भी कहा किसी ने कुछ नहीं.
वेटर ने दोनों के बीचोबीच कोक रख दी.
"कोक का नाम सूनते ही इतनी हैरान क्यों हुई? तुम भी पिलो; मना थोडी कर रहा हूँ."
"मुझे नहीं पिना है. मैने वैसी प्रतिज्ञा ली थी."
"क्या? प्रतिज्ञा? कब?" अब उसने उसे हैरानियात से देखा. मन में हंस भी पडा पर ज्याच्या नहीं.
"कालेज में... खैर छोडो तुम पिलो."
"कोक ना पिने की भी प्रतिज्ञा होती है क्या? वैसे क्यो ली थी ये प्रतिज्ञा?"
"रहने दो. तुम फिर पियोगे नहीं."
"तुम बताओ तो सही. मुझपर किसी बात का असर नही होगा. मैं एक झपेट मे निगल लूंगा."
"अच्छा, तो सुनो. कॉलेज मे एक संस्था आयी थी. उन्होंने एक डॉक्युमेंटरी दिखाई थी. जहां यह कोक बनानेवाली फॅक्टरिया खडी थी, वहाँ फॅक्टरी की वजहसे उन गावो को ही पिने का पानी नही मिल रहा था. उपरसे ये कोक कंपनिया गंदा पानी नदियो मे मिलाती थी. गाववालो के सफेद चावल भी काले पकते थे. कितने लोगो की उंगलिया झड चुकी थी. किसीका पेट फुल गया था. बच्चे तो बिमारी लेकर ही पैदा हो रहे थे. बस! तब हमे शपथ दिलायी की, ऐसे कोक हम नहीं पियेंगे. बस, तबसे छूंती भी नहीं."
इतना कह कर वो अपने उडद वडा सांबार मे डूब गयी.
उसके दिल में ख्याल आया, 'हद हो गयी! कॉलेज की बात अबतक पकड के बैठी है? ऐसेही मुझसे कोई वादा कर ले तो...' उसने दिल की वह बात वही छोड दी. फिर गला साफ करते हूवे उसने लडकी को पुछा,
"अब मैं क्या करु? चपटालू या.."
"तुम्हारी मर्जी. वैसे मुझे पुंछ रहे हो तो मना ही करूंगी."
"तुम अपनी इन प्रतिज्ञाओं के चक्कर मे मेरे पैसे बचाओगी या जेब खाली करोगी?" उसने झुंझला कर कहा.
वो हाथ धोने के लिये खडी हुई. मुस्कुरा कर बस उसने इतना ही कहा,
"आजमा लो... अभी थोडा और रास्ता भी तो इकठ्ठे चलना हैं." वो वॉश बेसिन के तरफ जैसे ही मुड गयी. वह समझ गया की, इश्क मे इतना भी अजनबी रहना बेवकुफी होती है!!

- हिनाकौसर खान-पिंजार
९८५०३०८२००

मुलाकात

तुझसे मिलना अौर खुदसे जुलना एकही तो बात है तुझसे किये हर वादे मे खुदसे मुलाकात है

पता

तुझे चिठ्ठी लिखते समय
नज़ाकत से पेश अाता हूँ
तुझे कोसना भी हो तो
बड़े लिहाज रखता हूँ
दिल के काँटे अल्फाजों को ना छुए
ये पुरी कोशिश है मेरी
क्या करू?
अाजकल तुझे लिखी हुई चिठ्ठीया
कोई मेरे दिल के पतें पर छोड जाया करता है!

बातें - ७

पहेलीयाँ मत बुझा ए शायरा! सीधे सीधे दिल की बात कह दिया कर पहले ही बहुत उलझ चुका हूँ
जिंदगी के पोशिदा सवालों मे

---

जो सवाल पोशिदा है
उनके जवाब क्यो ढुंढ रहे हो
जो महफूज हैं जज्बात नकाबों के पीछे
उन्हे बेपर्दा क्यो कर रहे हो
खामोशी हर बार नाराजगी थोडी होती है
अनगिनत अल्फाजोंकी रीप्लेसमेंट भी होती है..
और हां जनाब...
अक्सर सुलझते नहीं वो उलझने
जिनमे दिल बेहाल हो
अकलमंदी सुलझे होने मे ही नहीं होती
बिघडेल हाल, जाल मे फंसे रहने में भी होती है..


---

खामोशी

तुझे पता है...
इस वक्त रात बडी चुपचाप सी है
अौर आसमान भी खामोश है

अासमान यूँ बैठा है सामने
जैसे कोई हमदम
सीने मे कैद घुटन को
अाँखोसे बहा कर हो जाता है बेअल्फाज़
बिलकूल वैसेही,
इस वक्त खामोश है आसमान
और ये रात भी चुपचाप सी है...

अमावस की इस रात
सारे पहरों से दूर
बड़े अरसे के बाद मिल रहे है वो
सुकूनभरे काले सन्नाटे मे
जहाँ दर्द भरी अाह भी
कोहराम सी भाती है
इसीलिए तो चुपचाप सी है ये रात
अौर आसमान खामोश बैठा है...

रात अपने दामन से
हलके हलके पोंछ रही है
अासमान की नम अाँखे
खुद के रुख़्सार को नज़रअंदाज करते हुए
जो भीग रही है
बहते पल अौर बूँदे-ए-अश्क मे
अौर अासमान छोड रहा है
निला मयस्सर खुशहाल नकाब
तोहमत भरे काले रंग की ख्वाहिश मे
मशिय्यत पुरी हो फिर भी
सहर भर की ही देरी है

इसीलिए तो,
रंजीशभरा आसमान खामोश है
और ये रात भी अाज बड़ी चुपचाप सी है...

Monday, July 9, 2018

गुनाह

दिल के खयालों को
अल्फाजों के हवाँले करने जैसा गुनाह नही
अक्सर...
दिल से निकली बात
कागज़ तक अाते अाते
कई नकाब, कई रंग अोढ लिया करती है

शगुन

हम तो रूके हुए है क्योंकी रास्ते मे बारीश अाकर खडी है कहते है के, बिच राह अाई बारीश को टाल कर अागे जाना अच्छा शगुन नहीं होता

छाता

छत्री लिए बगैर बारीश में चला जा रहा हूँ
पर अंदरसे बूँद की इक भी टपकन सुनाई नहीं दे रही...
क्या अाज बारीश का दिल कहीं अौर है?
या फिर मेरे दिल के हाथ कोई छाता लग गया है?

तू न अाया

मेरी दर्जनो अधुरी नज्मे
रूठ कर खिडकी मे जा खडी है
कहती है के
बारीश तो अा गई, पर तू न अाया!

अनकहीं

कुछ अनबन हुइ अौर हम जुदा हुए
बातों से लेकर उधारी के खातों तक
हर जगह तालों मे कैद हुई
हमारी अपनी कहीं जानेवाली जगाएँ
पर्सनल कर्फ्यु से सुनसान हुई
फिर दोस्त बटें
उसने मिलने की जगाएँ बटी
रास्ते बदले
अौर चाल भी...
वक्तने यादें रोंद दी
अादतें, अड्डे, सलिके, तेवर,
ना जाने क्या क्या...
पर तुझसे तनहाई मे बात करने का
तरीका ना बदल पाया
अब तो अनबन की वजह भी
भूल चुका हूँ मै
याद है तो सिर्फ तेरा जाना
क्या तुझे याद होगा?

सालों बितें
हम फिर मिलें
तू सामने अाई तो मैने अावाज दी थी,
''ए हरामखोर!''
तु मुझे देखे बिनाही पहचान गई
तेरी अाँखे अब भी वैसी की वैसी है रे!
बस उस दिन कुछ जादाही बोल रही थी
मैने तुझसे कुछ ना कहाँ, चला गया!
तु पिछे अाई, तुने पुछाँ
''मै तो जिद्दी थी ही
पर तू मेरा कान मरोडते हुए
मुझे वापस क्यों ना ले गया?''
अब कैसे कहता तुझे?
मै दिल में वही सवाल लिए
उम्र काटें जा रहा था...

Saturday, July 7, 2018

बातें - ६

अाप कहों ना कहो
हम तो लिखेंगे
कुछ वादे सामनेवाले से नही
अपने अाप से भी होते है

---

अक्सर वादे अपने आप से ही होते है
हम तो बहाने बनाते हैं
किसी और के नाम के
उसे पुरा करने के वास्ते

बातें - ५

पर बडे छुपे रुस्तम हो तुम
भेजते नहीं अपनी कहाँनिया
अपने आफसाने
मांगना पडता है...
या फिर अब भी ऐतबार नहीं के समझ पायेंगे हम उन्हे

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शक तेरी समझदारी पे नही
मेरे तखय्युल पे है
अक्सर लगता है
जहाँ मै थम जाता हूँ, वहाँ तू शुरू होती है

Friday, July 6, 2018

चांदणी रात

हॉटेल रूमच्या बाल्कनीत उभं राहून दोघे खाली पहुडलेलं गर्द रान पाहत होते.
रंगांची रांगोळी सावरत सूर्य उतरणीला लागलेला. समोरचा मऊसूद देखावा अंधाराची शाल पांघरत होता. अाकाशाच्या कोपऱ्यातून चंद्राची कोर संथ पावलं टाकत पुढं येत होती. तिचे हात बाल्कनीच्या कठड्यावर होते. ती त्यावर रेलून एकटक समोर पाहत होती. तिच्या चेहऱ्यावर पडलेला मावळता उजेड अाणि किंचित अंधार यांचं मिश्रण त्याला वेडावून टाकत होतं.
किती स्निग्ध!
तो खुर्चीवरून उठत म्हणाला, ''तुला माहितीए...''
तिनं मान वळवून मागे पाहिलं. तिच्या चेहऱ्याची एक बाजू अंधारली. तो अाणखीनच मोहरला. तिच्या जवळ गेला.
''मला तू या क्षणी फार हवीहवीशी वाटतेयस.'' त्याने तिचा हात हलकेच हातात घेतला.
''असं वाटतंय, हा काळ इथेच थांबावा. हा मंद प्रकाश असाच तेवत राहावा. मी तुझा हात हातात घेऊन या हिरवाईतून वाट काढत असंच थेट क्षितीजापर्यंत जावं. शब्द नसावेत, नाद नसावेत, फक्त तू अाणि मी!''
त्याचे स्वप्नील डोळे अोलसरपणाची झाक घेऊन चकाकत होते. तिनं त्याच्या डोळ्यांला डोळा भिडवला. ती म्हणाली,
''चुतिया अाहेस का तू? एका रात्रीसाठी रूम बुक केलीय अाणि मला बाहेर कुठे घेऊन चाललायस?''
तो तिच्याकडे पाहतच राहिला.
''प्रोटेक्शन अाणलंयस ना?'' तिनं भुवई उंच करत म्हटलं.
तो तिला पाहून गालातल्या गालात हसू लागला. त्याच्या मागोमाग तीही!
ती हातातला त्याचा हात हळुच दाबत खट्याळपणे म्हणाली, ''बाय द वे! माणसाला जे हवंहवंसं वाटतं ना ते त्यानं जवळं घ्यावं. नुसतं बोलत बसू नये.''
त्याचं हसणं विरत गेलं. तो शांत झाला. त्याच्या हाताची पकड घट्ट झाली. तिनं त्याला हळुवार अोढत अातमध्ये नेलं.
रानावरचा प्रकाश अोघळून गेला होता. त्यावर चांदणी रात पसरत होती.

टहनी

'तुम मुझें कभी समझ नही पायें'
ये कह कर चली गई वो

हा थोडा इंट्रोवर्ड हूँ
जादा बतीयाता नहीं
पर उसे देखना-सुनना बड़ा अच्छा लगता है मुझे
जादा बात ना करू तो दिल में प्यार नहीं होता क्या?
शायद उसकी बात सही भी हो
शायद मैं पुरी तरह से उसे समझ ना सका
पर कुछ तो होगा जो मेरे हाँथ अाया होगा

अब कैसे बताऊँ उसे
के जोरो की बारीश मे
सुखी हुई टहनी भी
दो-चार बूँदे पकड ही लेती है...

काँटा

बाँदलों की अाहट होती है
अंधेरा सा छाने लगता है
उनकी गड़गड़ाहट से पहले ही
अंदर कोई समंदर मचलने लगता है

बड़ी कोशिशो के बावजूद
दिल का चैन उड़ जाता है हवाँ पर
अाफ़ाक पर दिखने वाला तुफान
धीरे धीरे करीब अाता जाता है

दिल दिमाग से कर देता है बगावत
अौर बादलों से पार होती हुई
बड़ी ऊँची...अौर ऊँची होती जाती है
बेचैनीयों की मिनारें

दौडती साँसे हार जाती है शर्त
धड़कतें हुए दिल से
तब घुटन हजारों पैरो से
दिल की फर्श पर रेंगने लगती है
 उस सारी बेचैनी को समेट कर
पाँव के तले से कोई काँटा निकाला जाए
वैसी अंदर चुभती इक नज्म को
अल्फाजों के चिमटे से पकड कर
खिंच लेता हूँ बाहर
उसे किसी काग़ज में बांध कर
फेंक देता हूँ अंजान कोने मे
चैन की साँस लेते हुए...

अगर ये काग़ज ना होते ना...
तो ये नज्मे जिंदा नहीं रहने देती!

Thursday, July 5, 2018

पाबंदी

वैसे तो किसी का बाप भी हम से
कुछ लिखवा नहीं सकता
पर ये बारीश लिखने पऱ
मजबूर कर देती है
मौसम की पाबंदी का आलम तो देखो
बिती यादों को अल्फाजों के जोडे मे दुल्हन सा सजा देता हूँ

कलम

बड़ी जोरो की बारीश हो रही है
कलम निचें रखने की भी फुरसत नहीं
इतना भीग चुके है हम
के ड़र लगता है
अगर ये ना रूकी
तो शाम तक कही किताब ना छप जाए...

खानाबदोश

आंखों पर दस्तक हुई
पलके उठी
सामने देखा
तो बारीश का माहोल था

अर्श से छलके हुए
पैमाने की बूंदे
इस हाथ गिरी तो
दिल ये मदहोश था

बादल गरजे
बिजलीया चमकी
पर सारा जहाँ
खामोश था

सादगी भरे पानी मे फिर
मेरी रूह की कश्ती चली
मै ही मांझी मै ही नय्या
मुझ मे उसी का अक्स था

आंख बंद कर लांघ दी
सहमे मकानो की गली
बिते अरसे और आंखे खुली
तब मै खानाबदोश था...

नखशिखान्त

गावी पाऊस अाला
की घराशेजारून अोढा वाहायचा
मी होडी सोडायचो त्यात
मी खाचखळग्यातून धावत
पाठलाग करायचो तिचा
पार दुथडी भरलेल्या नदीपर्यंत
पण ती निघून जायची पुढे
हरवून जायची पाण्यात
मला नदीचं मोठं पात्र बघितलं की धडकी भरायची
पण तरीही काठावर तासनतास बसून राहायचो
वाटायचं एखादी होडी भेटेल अापल्याला
वरून पडणारा मुसळधार पाऊस
चिखल, भरून वाहणारी नदी
मी नखशिखान्त चिंब होऊन जायचो...

पुण्यात कॉलजच्या गेटवर
पावसाचं पाणी वाहायचं
मी त्यात होडी सोडत असताना
मागून हसली होती ती
पाणेरी डोळे, पावसात भिजलेले केस
भिजून शरीराशी सलगी करणारा पंजाबी ड्रेस
मी त्या दिवशी नखशिखान्त चिंब भिजलो
ती अामची पहिली भेट...

अंधेरी लोकलमधून उतरलो अाणि पाऊस सुरू झाला
तो वरच्या पत्र्यावर मस्त ताशा वाजवत होता
त्या अावाजात धुंद असताना धडक झाली
तिची छत्री अाणि ती दोन्ही फलाटावर अाडव्या
मी हात पुढे करूनही तिने तो घेतला नाही
तिचा फणकारा अावडला, गोड होती
अामच्या ट्रेनच्या वेळा मिळत्याजुळत्या होत्या
रोज डोळ्यांमध्ये 'सॉरी' घेऊन
मी अाणि पाऊस प्लॅटफॉर्मवर तिची वाट पाहू लागलो
नजरेच्या सरी रोज कोसळायच्या
मग एक दिवस तिही भिजली
कॉफी झाली
दुसऱ्या वेळी पिक्चर
काही दिवसांनी बिचवर गेलो
पावसाच्या धुंद वातावरणात तिचा हात पकडला
अाम्ही दोघं रात्री माझ्या रूमवर गेलो
तो मुसळधार कोसळत होता
त्या रात्री अाम्ही दोघं नखशिखान्त...

अाज गावी अालोय
माझी मुलगी अोढ्याकडे गेलीय
जाताना माझ्याकडून होडी घेऊन गेलीय
अाभाळातून पडणारं पाणी
झिरपत, वाहात, कोसळत, वाफ होत
नव्या रूपात पुन्हा खाली येतं म्हणतात...

खिडकीत उभं राहून तिच्या हातचा चहा घेताना
कागदाची होडी अाणि मागे धावणारी छोटी पावलं दिसली
नदीकडे जाणारी...
तू अाता तिलाही नखशिखान्त चिंब भिजव
अायुष्यभर...

Wednesday, July 4, 2018

अाशियाँना

अाशियाँने की खोज
चार दिवारों तक अाके खत्म हो
ये जरूरी तो नहीं...
उज़डे दिल में दबीं उम्मीद भी
किसी का अाशियाँना बन जाया करती है

अलमारी

यादें भुलाने जैसा
पागलपन ना कोई
भिगी अलमारीयों के दरवाजे
अक्सर बड़ी जल्दी खुल जाते है

फुर्क़त

दोनो CCD मे बैठे कॉफी पी रहे थे। अास-पास चहलपहल थी।
''मै कल घर से पाँच बजे निकलेवाली हूँ।'' उसने कॉफी का घूँट लेते हुए कहाँ।
''तू तो अॉफिस मे रहेगा ना उस वक़्त? मेरी फ्लाईट अाठ बजे है। मेसेज करूँगी निकलने से पहले।''
वो कॉफी के मग को ताक रहा था।
''सुन.'' उसने निचे देखते देखते अावाज दी।
''क्या?''
उसने नजर धीरे से उपर उठाई। उसे देखाँ अौर कहाँ,
''तू मुझे अच्छी लगती है।''
उसकी कॉफी अाधे रस्ते रूक गई। फिर कुछ देर सिर्फ़ अासपास की अावाजे अाती रहीं। उसने धीरे धीरे कॉफी खत्म की अौर कहाँ।
''तेरे घर पर मेरी पॉवरबँक पडी है। अगली बार इंडिया अाऊंगी तो लेके जाऊँगी।''

वो उस रात बडी देर से सोया।

वो साडेपाँच बजे एअरपोर्ट पहुँची। वो राह देख रहा था। उसे देख वो चौकी नही।
वो पास अाया। उसका बॅग उठा लिया। दोनो चलने लगे।
थोडा वक़्त था। दोनो इक जगह बैठे। अासपास थोडा शोर था। दोनो नजदीक बैठे थे। पर अाँखे कहीं अौर थी। शायद अाँखो को खुद पर ऐतबार न था।
''तुझे पता है के मेरा लंडन जाना...''
''हा पता है!''
उसने बडी शांती के साथ कहाँ।
''कल तुने जब वो बात कहीं तो मुझे लगा के...''
''वो भी पता है।''
वो अाने-जानेवाले लोगो को देख रहा था।
''तो तू रोकेगा नही?''
''ना! तू रूकेगी नही।''
उस बात पर दोनों की नज़र मिली। बड़ी देर तक वैसी ही रही।
शायद इकदुसरें को जानना जरा जादाही हो गया था।

उसने पॉवरबँक का पाऊच उसके हाँथ मे दिया।
''क्यों ले के अाए?'' उसने कुछ नहीं कहाँ। दोनो खड़े हो गए।
फिर वो सीधे उसकी अाँखोमे देखते हुए बोला, ''देख। जरूरी नहीं होता, हर बार...'' अौर उसने बात अधुरी छोड दी... जानबुझ के।
''फिर भी...'' वो सटपटाई।
''चल छोड! ये पल बहुत अच्छा है।''
''पता है।'' वो एक कदम उसके नजदीक अाती बोली।

अनाउन्समेण्ट हुई। उसे जाना था। उसने वो नज़र पढी अौर उसे बाँहो मे समेट लिया।
धड़कन कानों तक सुनाई दे रहीं थी। अासपास नज़रें थी। पर उन दोनो नर्मसार बंद अाँखो को कुछ ना दिखा।
दूर होने से पहले होंठ करीब अाए। इक साँस की दूरीं तक...
लेकीन इकदुसरे से मिले नहीं। फाँसला कायम रहा।

वो चली गई। बहुत दूर...
पिछे मुड के देखे बिना ही चली गई।

जब होंठ नजदीक थे तो उसने धीमे से कहाँ था,
''ये फाँसला मुकम्मील ना हुअा, तो उम्र भर याद रहेगा।''
वो बोल पडा, ''ठिक! पर मुडना मत!''

दोनोभी दिल पर अजिब सा बोझ लिए चल पडे।
शायद वो फिर मिल भी जाऐं। पर वो इक साँस का फाँसला... वो अब मिट ना सकेगा!
वो उस पल मे कैद हो चुका था।

ट्रॅफिक

''This fucking traffic...''
वो चिढ़ा हुअा था!
गुगल मॅप पर बांद्रा से कांदिवली तक लाल रंग की लंबी लाईन दिखा रही थी। वो एक घंटे से बैठे बैठे उब चुका था। अॉफिस मे हुई अनबन अभी तक सर मे गटर के पानी जैसी बह रही थी। उबर की कार की थंडी हवाँ मे वो उस बात को भुलने की कोशिश कर ही रहा था, के तभी उसने मोबाईल की स्क्रीनपर लाल कतार देख ली। वो समझ गया की जिंदगी के अगले तीन घंटे ये ट्रॅफिक निगलने वाला है। उसका सर घुम गया।
मुँह से गाली निकलते ही उसने रिअर व्हू मिरर मे देखा। ड्राईव्हर की अाँखे उसीको देख रही थी। दोनो की नजरें अाईने मे इकदुसरे से टकराई। फिर झट से यहाँ वहाँ देखने लगी। उसके मोबाईल की बॅटरी उतर चुकी थी। बाहर बेजान गाडीयाँ खडी थी। शिशें बंद थे। सारा माहोल किसी पेंटींग के जैसा दिख रहा था। बडी बोअर पेंटींग थी।
उसने अागे देखा। ड्राईव्हर बाहर देख रहा था। उसने गाडी मे बैठते वक्त ड्राईव्हर को डाँट दिया था। क्या मेरी भडास उसपर निकल गई? उसे थोडा बुरा लगा। अब ड्राईव्हर रेडीअो के बटन घुमा रहा था। उन दोनो के बिच की पिछले घंटेभर की चुप्पी को तोंडा अौर कहाँ,
''भय्याजी, ये गाडी अापकी है?''

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अाज सुबस से वो बडा घुमा था। एक के बाद एक काम! दोपहर का खाना भी ठिक तरीके से खा न सका था। सुबह इक बंदे से झगडा हो गया था। रूल्स के मुताबिक वो उसे कुछ बोल ना सका, इसीलिए उसका दिमाग मन ही मन मे उससे लड रहा था। बाहर का गरम अौर अंदर का थंडा मौसम उसे हमेशाही अनईझीनेस की तकलिफ देता था।
उसे कुर्ला मे कॉल मिला। उसने स्वस्तिक पार्क से सवारी को उठाया अौर सायन के रास्ते चल पडा। वो उसकी गाडी मे बैठनेवाले हर यात्री से हसीं खुशीं बात करता। उन्हे गुड मॉर्निंग-गुड नाईट कहता। लोग खुश हो जाते। पर इस सवारी के मिजाज पहले से ही बिगडे हुए थे। सावरी ने गाडी कुछ कदम अागें पार्क करने की बात पर उसे बडा डाँट दिया था। वो चुप रहा।
गाडी बांद्रा तक पहुँचने मे घंटाभर लग गया। कांदिवली की मंजिल ट्रॅफिक की लहरों पर दूर निकली दिखाई दे रही थी। कम से कम तीन घंटे। उसने कॅल्क्युलेशन कर ली। क्या करे तब तक? पिछे दुसरा कोई बैठा होता तो उसने बात छेड दी होती। पता नही ये सवारी अौर किस बात पर चिढं जाए। तभी...
''This fucking traffic...''
उसने रिअर व्ह्यू मिरर मे देखा। सवारी उसी की तरफ देख रही थी। उसने झट से अाँखे घुमा ली। बाहर देखाँ। गाडीया पत्थर के जैसी खडी थी। उसकी कार कई अलग अलग गाडींयों से घिरी हुई थी। उपर से कोई ब्रिज गुजरा था। अासमान भी दिख नही रहा था। जिंदगी रूक गई थी। फँस गयी थी।
वो सोच ही रहा था के गाने चला दूँ, तभी सवारी की अावाज अाई।
''भय्याजी, ये गाडी अापकी है?''
उसके चेहरे पे मुस्कान अाई। उसने नजरें रिअर व्ह्यू मिरर की तरफ मोडीं।
गाडीयां अागे बढ़ने लगी।
ट्रॅफिक खुल रहा था।

डिश

बडा अालिशान दरबार सा था
प्लेंटे, चम्मचों की खुसफुसाहट के उपर
विदेशी संगीत के सूर लहरा रहे थे
मेन्य़ू से कुछ चिजें चुनी गई
रसोईघर मे चुल्हे जल उठें
कई रंग अौर जायकों की पेहरन मे
इक लाजबाब डिश पेश की गई
छुरी-चम्मच काम पर लगे
स्वाद तो ऐंसा लुभावना
के दाँतों से निवाला निचें छुट ना रहा
जब वो पेट में पहुँचा
तो मानो दार-ए-खुल्द के दिरार हुए

तभी...

उसी मैदे-अाँटें-तेल से बना एक वडापाव
अालिशान दरबार के पिछें की गली में
किसी के पेट मे जाकर
जिस्मानी भूक से लड़ रहा था...

सानी

तू सानी मै पानी

तू रंग मिला तो हो जाऊँ रंगीन तू नाव छोडें तो गहरा समंदर 

तू प्यासा हो तो हो जाऊँ दर्या तू रोक ले
तो बन जाऊँ झील

तू धूँप दे
तो खिल जाऊँ
हवाँसा चले
तो डोल जाऊँ

चल हर डगर 
मेरे हमसफ़र
रह साथ तू
बन राहबर

ये लौ बुझें
तो सँभाल तू
फडफडाए तू
तो मै सँभाल लू

मेरे शाद की
मेरे ख्बाब की
हर याद की
दरकार तू

ना ख्वाहिश कोई
ना माँग है
राग़बत मेरी
बेदाग है

ना पाऊँ तुझे
तो गम नही
बस साथ चल
तू साथ चल

दर्या के उस
किनारें सही
पर साथ चल
तू साथ चल

अाँखे

अाँखे पलक झपकती है
टुकटुकाती है
यहाँ वहाँ घुमती है
रूबरू होती है हजारों बार
पर हर बार वो गिली हो
ये जरूरी तो नहीं

फिर कभी
सावन के मौसम मे
या झुलसती किसी दोपहर मे
जब सारा कुछ चलते हुए भी
रूका रूका सा लगता है
तो अाँख पहुँचती है
अंदर झाँकने की कगार पर
तभी उसकी नजर मे
अा जाती है इक पलक
कहें तो मुजावीर
कहें तो अजनबी

पलक की पेशानी
अौर उसपर उठीं शिकन
उस टिमटिमाती अाँख को
पहले क्यों ना दिखी?
क्या परे देखने की चाह मे
भूल गई वो खुद के पासबान को?

अब चल पडे है अश्क़ जो
वक्त के रूख्सार पर
बितीं रातों के गम हो क्यों?
अब चुभी तो सही चुभी...

किताबें

इक किताब खरीदनी थी मुझे
पुरे सौ रुपये की!
सिगरेट छोडी
बाहर का खान-पान कम किया
घर की रद्दी बेचीं
पार्ट टाईम नौकरी भी तो कि थी
तब कहीं जाकर
वो किताब ले पाया था

अाज मेरे पोते
डॉमोनोज-पिझ्झा हट की स्लाईस मे
ना जाने कितनी सारी किताबे खा जाते है...

रास्ते का पत्थर

शहर के इक कोने मे खडा
रास्ते के मिल का वो पत्थर
बुढाँ हो चुका है
मोबाईल के हर नए व्हर्जन के साथ

जब अंग्रेजोने उसे गाडा था वहाँ
तो इक रूतबा था उसका
लोग चले अाते थे उसके पास
दुरीयोंका अंदाजा पुँछने
वो भी बता देता फिर
सिना ताने...
अाज वही सिना धसँ चुका है
रास्ते की सालाना भरन मे

वो नक्काशी समझता था
खुद पर लिखे हुए मिलों के अल्फाजो को
उनमे से कुछ अल्फाज
हवाँ के साथ चल पडे
कुछ अाज भी गडे है
सिमेंट के फुटपाथ के निचें

गुगल मॅप पर चलती है रास्तों की गुफ्तगु
पर उस बुजुर्ग के जिक्र कभी होते नही
वो खो चुका है खुद की
जबान, वजूद, रूतबा अौर मायना भी...

इक दिन कुछ कदम उसके पास अाए
बातें हुई, रोंशनी के कुछ फव्वारे उडें
अौर दुसरे दिन अख़बार में न्यूज छपीं
''अंग्रेजो के जमाने का पत्थर विकास काम मे हटायाँ जाएगा''
इतिहास की धरोहर, दस्तावेज, याँद...
ऐंसे कुछ अल्फाज बिखरे थे उस न्यूज मे
किसी ने पत्थर के पास खडे होकर न्यूज सुनाई थी...

उसे सुन कर अच्छा लगा
वो मन ही मन बुदबुदाया
''चलो, वर्तमान का ना सही
पुरी तरह से इतिहास का तो हिस्सा बन लू...''

Monday, July 2, 2018

अासमान का चाँद

इक दिन गाँव मे
अासमान का चाँद
जमिन पर उतर अाया
दुसरे दिन हर मोहल्ले मे
मुशायरों की गुंज थी
मेरी भी इक नज्म
बडी पसंद अाई लोगो को
उसकी वाहवा की अाड मे
रश्क-ए-कमर के दिदार भी हुए थे

फिर कई सालों बाद...

इक दिन शहर मे देखा
चाँद फिर जमिन पर उतर अाया था
दुसरे दिन अख़बार के किसी पन्ने पर
न्यूज छप गई थी
फेसबुक-ट्विटर पर भी हुई थी
उस चाँद की नुमाईशे
गौर किजिएगा जनाब
मेरी पोस्ट को पाचसौ लाईक्स मिले है!

शहर

जिंदगी की जद्दोजहत मे
कभी झाँक के खुद मे ना देखा
जिस शहर मे जिने अाया था
पता नही कब वो मुझ मे जिने लगा