Wednesday, August 12, 2020

सफर

सूरज ढल रहा था. उसकी मुलायम रोशनी मे रेत के किले की छोटीसी परछाई बनी थी. उसने कुल्फी की चिपचिपी स्टीक से किले मे खिडकीयाँ भी बनाई थी. अब दोनो मिलकर उस घरोंदे को देख रहे थे.
"अच्छा बना है ना?"
"हाँ! अच्छा तो बनेगाही. मैने इतनी मेहनत जो की है."
"अच्छा जीऽऽऽ? तुमने?" उसने अाँखे बडी कर दी.
वो मुस्कुराया. "अच्छा बाबा, हमने!"
"वैसे नाम तो सिर्फ मेरा होना चाहिए... पर चलो! थोडा क्रेडीट देही देती हूँ तुम्हे."
अपनेही कहे पे वो हसती रही. उसे हसते हुए देख खुश हुआ. उसने जेब से वो चिठ्ठी निकाली.
"ये साथ क्यों लेके आए?"
"पोस्ट करने."
"फिर से? एक बार चोट खाके भी बाज नही आए!"
"शायद..."
वो किला छोड उसे देखने लगी.
"चिठ्ठी की क्या उम्र होती है?"
"मतलब?"
"मतलब... क्या चिठ्ठी का सफर लिखनेवाले से पढनेवाले तक का ही होता है? बस... इतना सा ही होता है क्या उसका जीवन?"
"हा!" उसने किले मे नई खिडकी बनाते हुए अासानिसे कहाँ. वो उठ कर चल पडा. समंदर के साहिल तक पहुंचा. उसने जेब से छोटीसी शिशी निकाली. उसने वो चिठ्ठी शिशी मे डाली और उसे दूर पानी मे फेंकी. ढलते हुए सूरज की रोशनी मे पानी पर तैरती हुई शिशी एक बार चमक उठी. वो मुडने लगा तो उसने देखा के वो पास आकर खडी थी.
"क्यों फेंक दी? मुझे अच्छी लगती थी वो चिठ्ठी. बेशक मेरे िलए नही लिखी थी, पर थी तो मेरी..."
"जैसे तुमने कहाँ; जब तुमने चिठ्ठी पढ ली तो उसका सफर खत्म हो गया. मैने सोचा के उस चिठ्ठी का नया सफर भी हो सकता है..."
वो मुस्कूराई. उसका हात पकड कर नंगे पाव रेत पर चलने लगी.
दूर पानी पर एक छोटासा जहाज अपने नये सफर पर निकल पडा था...

साहिल

लहरों की लाख सरगोशीयों के बाद भी
साहिलने चुप्पी नहीं तोडी
उनकी अनगिनत चिखोंने भी
उसे टस से मस न किया
जब हार कर वो पिछे मुड़ी
तब उसने देखा
साहिल के किनारें गिले थे!

दंश

नितळ चांदण्या खुडल्या तरी चालतील एकवेळ
पण तण माजलेलं रान साफ करायला हात धजावत नाहीत
आमच्या अस्तित्वाचे भार नेहमीच नको त्या खांबांवर तोललेले
आम्हाला त्यावर सुंदर राजमहाल बांधणं कधीच जमत नाही,
पण खांबांचे ते भग्नावशेष सोडवतही नाहीत
आमचं मन दुतोंडी मांडूळासारखं सतत वळवळत राहतं
नव्यानं उमलणाऱ्या नितळ चांदणीला डसण्यासाठी