Thursday, July 12, 2018

पन्ने

वो किताबों से लदी उन अलमारीयों के बिच खड़ा था. वो पिछें से अाई.
''चलो! ढूँढ़ना है ना? परमीशन सिर्फ दो घंटे के लिए मिली है.''
दोनो ढूँढ़ने लगे. उसके कॉलेज के जमाने की प्रेमकहाँनिया सुनना उसे बड़ा अच्छा लगता. एक दिन जब उसने कहाँ, के बीस साल पहले फिजिक्स की इक किताब में रखी चिठ्ठी कभी पहुँची ही नहीं, तो उससे रहा ना गया. वो उसे खिंच के कॉलेज की लायब्ररी मे ले अाई. उसे देखनी थी वो चिठ्ठी. पर वो इतना इंटरेस्टेड नहीं था.
''अरे क्या कर हो? ढूँढ़ो ना!''
''रहने दो ना मनु!''
''क्यों?''
''मुझे लगता है चिठ्ठी नहीं मिलेगी. पिछले बीस सालों मे किसी पढ़नेवाले से गीर गई होगी कहीं, या फिर ले गया होगा कोई...''
''अरे ढूँढ़ो ना तुम! शायद होगी अभी भी वहीं...'' उसने इक किताब को रॅक से उतारते हुए कहाँ.
''दरसल मै नहीं चाहता की वो चिठ्ठी मिलें. अगर वो चिठ्ठी मिल गई तो...''
''तो क्या?''
''बीस साल से उस चिठ्ठी को किसी ने ना पढ़ा... सोचो, कितनी अकेली होगी वो? मुझे उसे देख कर बड़ा बुरा लगेगा मनु!''
''अकेली कहाँ? दो पन्ने भी तो होंगे ना उसके साथ! अब तक तो वो भी रंग बदलकर गुलाबी पड गए होंगे.'' वो हंसकर बोली. उसने सफेद पडते हुए बालों की लट को कान के पिछें सरकाया अौर वो किताब ढूँढ़ने लगी. वो भी उसके साथ हो लिया...
पन्ना तो उसने भाँप लिया था. शायद चिठ्ठी भी...

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