Wednesday, July 11, 2018

एक पन्ने की चिठ्ठी

एक पन्ने की चिठ्ठी लिखने बैठा
सोचा! एक ये बात अौर दो वो बातें लिखकर पुरी कर दूँगा
लिखना शुरू करते ही दो पन्ने भर गए
जो बातें कहनी थी उनके बिच
दिमाग अपनी कहानियाँ पिरोने लगा
चिठ्ठी थोडी लंबी होती चली गई
फिर दिल कूद पडा
यहाँ वहाँ की बातें करने लगा
चिठ्ठी अौर लंबी होती चली गयी
लिखते हाँथ चिड गये दिलपर
''ए बिनबुलाए मेहमान! दस पन्ने हो गए! देख तो सही!''
पर दिल खुदकी मनमानी करने पर तुला हुअा था
उसके कदम जगह जगह पडते गयें
कुछ पुराने अनुभव थे
कुछ अच्छी-बुरी याँदे थी
कुछ कल्पनाऐं
तो कुछ गहरी उभरी सोच...

कई पन्ने बिते...
लगता है चिठ्ठी की डायरी बन चुकी है
बस अब लिखना अच्छा लगता है
वो पुरी करके किसीको भेजने का खयाँल
पहले कुछ पन्नो कि निचें दब कर
नजरअंदाज हो चुका है

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