कुछ अनबन हुइ अौर हम जुदा हुए
बातों से लेकर उधारी के खातों तक
हर जगह तालों मे कैद हुई
हमारी अपनी कहीं जानेवाली जगाएँ
पर्सनल कर्फ्यु से सुनसान हुई
फिर दोस्त बटें
उसने मिलने की जगाएँ बटी
रास्ते बदले
अौर चाल भी...
वक्तने यादें रोंद दी
अादतें, अड्डे, सलिके, तेवर,
ना जाने क्या क्या...
पर तुझसे तनहाई मे बात करने का
तरीका ना बदल पाया
अब तो अनबन की वजह भी
भूल चुका हूँ मै
याद है तो सिर्फ तेरा जाना
क्या तुझे याद होगा?
सालों बितें
हम फिर मिलें
तू सामने अाई तो मैने अावाज दी थी,
''ए हरामखोर!''
तु मुझे देखे बिनाही पहचान गई
तेरी अाँखे अब भी वैसी की वैसी है रे!
बस उस दिन कुछ जादाही बोल रही थी
मैने तुझसे कुछ ना कहाँ, चला गया!
तु पिछे अाई, तुने पुछाँ
''मै तो जिद्दी थी ही
पर तू मेरा कान मरोडते हुए
मुझे वापस क्यों ना ले गया?''
अब कैसे कहता तुझे?
मै दिल में वही सवाल लिए
उम्र काटें जा रहा था...
बातों से लेकर उधारी के खातों तक
हर जगह तालों मे कैद हुई
हमारी अपनी कहीं जानेवाली जगाएँ
पर्सनल कर्फ्यु से सुनसान हुई
फिर दोस्त बटें
उसने मिलने की जगाएँ बटी
रास्ते बदले
अौर चाल भी...
वक्तने यादें रोंद दी
अादतें, अड्डे, सलिके, तेवर,
ना जाने क्या क्या...
पर तुझसे तनहाई मे बात करने का
तरीका ना बदल पाया
अब तो अनबन की वजह भी
भूल चुका हूँ मै
याद है तो सिर्फ तेरा जाना
क्या तुझे याद होगा?
सालों बितें
हम फिर मिलें
तू सामने अाई तो मैने अावाज दी थी,
''ए हरामखोर!''
तु मुझे देखे बिनाही पहचान गई
तेरी अाँखे अब भी वैसी की वैसी है रे!
बस उस दिन कुछ जादाही बोल रही थी
मैने तुझसे कुछ ना कहाँ, चला गया!
तु पिछे अाई, तुने पुछाँ
''मै तो जिद्दी थी ही
पर तू मेरा कान मरोडते हुए
मुझे वापस क्यों ना ले गया?''
अब कैसे कहता तुझे?
मै दिल में वही सवाल लिए
उम्र काटें जा रहा था...
��
ReplyDelete