बारीश अाई
मै कलम लेकर निकल पड़ा
हरी-भीगी वादियाँ
बागों के फूल
गिली रेत के साहिल
पानी में उछलते-कुदते बच्चे
कहाँ कहाँ नहीं गया!
क्या क्या नहीं देखाँ!
बारीश को खुदमे समाएँ
गिला मन अौर गिली कलम लिए
घर अा पहुँचा
काग़ज सामने था
अौर हाँथ मे कलम तय्यार
तभी बिवीने हाँथ मे घडा थमा दिया, कहाँ..
''बडे अाये शायर... बाहर से भीग कर अाते हो,
यहाँ घर मे एक बूँद पानी नही है, उसकी फिक्र है?
जाअो! ले अाअो!''
मैने कलम छोडी
घडा उठा लिया
चाली के नल पर
बिवीयोंने भेजे हुए शौहरोंका ये शोर था
मन मे चली खयालो की नय्या
घडे मे गिरते पानी मे डुबने लगी
सारी अौरते दरवाजे-खिडकीयों से चिल्लाती
शौहरों की डोर खिंच रही थी
मेरे दिल की नज्म
उस भीड मे खोने लगी
तभी सारा अालम खामोंश हो गया
बिवी कॅरोडोर मे अाई थी
बोली,
''उपर अाईये! एक घडा बस हुअा! चाय तय्यार है!''
सारे उदास घडे मुझे जलनभरी नजरोंसे देखने लगे
घर अाया तो बेटी अलमारी से
अल्फाबेट्स के खिलौने निकाल रही थी
किचन मे कुछ खडखडाहट हुई
अौर मेरी जिंदगी की पहली नज्म
हात मे चाय का कप लिये मेरे सामने अाई
उसके पिठपर झुलती अल्फाजों की एक लडी
मैने हाँथ मे पकडकर खेंच दी
रुख्सार का रंग लाल हो चुका था
हम दोनो एक प्लेट मे चाय पिने लगे
सामने हम दोनो ने लिखी हुई इक नन्ही शायरी
अल्फाजोंको समेटनेकी कोशिश कर रही थी...
मै कलम लेकर निकल पड़ा
हरी-भीगी वादियाँ
बागों के फूल
गिली रेत के साहिल
पानी में उछलते-कुदते बच्चे
कहाँ कहाँ नहीं गया!
क्या क्या नहीं देखाँ!
बारीश को खुदमे समाएँ
गिला मन अौर गिली कलम लिए
घर अा पहुँचा
काग़ज सामने था
अौर हाँथ मे कलम तय्यार
तभी बिवीने हाँथ मे घडा थमा दिया, कहाँ..
''बडे अाये शायर... बाहर से भीग कर अाते हो,
यहाँ घर मे एक बूँद पानी नही है, उसकी फिक्र है?
जाअो! ले अाअो!''
मैने कलम छोडी
घडा उठा लिया
चाली के नल पर
बिवीयोंने भेजे हुए शौहरोंका ये शोर था
मन मे चली खयालो की नय्या
घडे मे गिरते पानी मे डुबने लगी
सारी अौरते दरवाजे-खिडकीयों से चिल्लाती
शौहरों की डोर खिंच रही थी
मेरे दिल की नज्म
उस भीड मे खोने लगी
तभी सारा अालम खामोंश हो गया
बिवी कॅरोडोर मे अाई थी
बोली,
''उपर अाईये! एक घडा बस हुअा! चाय तय्यार है!''
सारे उदास घडे मुझे जलनभरी नजरोंसे देखने लगे
घर अाया तो बेटी अलमारी से
अल्फाबेट्स के खिलौने निकाल रही थी
किचन मे कुछ खडखडाहट हुई
अौर मेरी जिंदगी की पहली नज्म
हात मे चाय का कप लिये मेरे सामने अाई
उसके पिठपर झुलती अल्फाजों की एक लडी
मैने हाँथ मे पकडकर खेंच दी
रुख्सार का रंग लाल हो चुका था
हम दोनो एक प्लेट मे चाय पिने लगे
सामने हम दोनो ने लिखी हुई इक नन्ही शायरी
अल्फाजोंको समेटनेकी कोशिश कर रही थी...
No comments:
Post a Comment