अाँखे पलक झपकती है
टुकटुकाती है
यहाँ वहाँ घुमती है
रूबरू होती है हजारों बार
पर हर बार वो गिली हो
ये जरूरी तो नहीं
फिर कभी
सावन के मौसम मे
या झुलसती किसी दोपहर मे
जब सारा कुछ चलते हुए भी
रूका रूका सा लगता है
तो अाँख पहुँचती है
अंदर झाँकने की कगार पर
तभी उसकी नजर मे
अा जाती है इक पलक
कहें तो मुजावीर
कहें तो अजनबी
पलक की पेशानी
अौर उसपर उठीं शिकन
उस टिमटिमाती अाँख को
पहले क्यों ना दिखी?
क्या परे देखने की चाह मे
भूल गई वो खुद के पासबान को?
अब चल पडे है अश्क़ जो
वक्त के रूख्सार पर
बितीं रातों के गम हो क्यों?
अब चुभी तो सही चुभी...
टुकटुकाती है
यहाँ वहाँ घुमती है
रूबरू होती है हजारों बार
पर हर बार वो गिली हो
ये जरूरी तो नहीं
फिर कभी
सावन के मौसम मे
या झुलसती किसी दोपहर मे
जब सारा कुछ चलते हुए भी
रूका रूका सा लगता है
तो अाँख पहुँचती है
अंदर झाँकने की कगार पर
तभी उसकी नजर मे
अा जाती है इक पलक
कहें तो मुजावीर
कहें तो अजनबी
पलक की पेशानी
अौर उसपर उठीं शिकन
उस टिमटिमाती अाँख को
पहले क्यों ना दिखी?
क्या परे देखने की चाह मे
भूल गई वो खुद के पासबान को?
अब चल पडे है अश्क़ जो
वक्त के रूख्सार पर
बितीं रातों के गम हो क्यों?
अब चुभी तो सही चुभी...
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