Wednesday, July 4, 2018

डिश

बडा अालिशान दरबार सा था
प्लेंटे, चम्मचों की खुसफुसाहट के उपर
विदेशी संगीत के सूर लहरा रहे थे
मेन्य़ू से कुछ चिजें चुनी गई
रसोईघर मे चुल्हे जल उठें
कई रंग अौर जायकों की पेहरन मे
इक लाजबाब डिश पेश की गई
छुरी-चम्मच काम पर लगे
स्वाद तो ऐंसा लुभावना
के दाँतों से निवाला निचें छुट ना रहा
जब वो पेट में पहुँचा
तो मानो दार-ए-खुल्द के दिरार हुए

तभी...

उसी मैदे-अाँटें-तेल से बना एक वडापाव
अालिशान दरबार के पिछें की गली में
किसी के पेट मे जाकर
जिस्मानी भूक से लड़ रहा था...

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