लोगो के बिचों बिच
अपनी पटरीओं से
दुसरी तरफ अधमरे इन्सान
पहले दर्जे के लोग मुँह मोड कर
इस तरफ चले जातें
बाकी के डिब्बो के लोग
इस तरफ अाने की अास लिए
उस तरफ...
ज्यादा भिड हो जाए तो पहले दर्जे के लोग
उस तरफ के लोगो को भलाबुरा कहते
पहले दर्जे की खाली जगाए देख कर
उस तरफ वालो कि मुँह से निकल जाती गालियाँ
उस दोनो तरफो मे कभी कभी बाँते होती
कोई पहचान का चेहरा दिखें तो हात हवाँ मे उठते
कभी कबार अाँखे टकरा जाए
तो चेहरे पे अा जाती कुछ लुभावनी लकीरे
वो हर रोज दोनो तरफों के बिच से गुजरती
देखती
सोचती
एक दिन उसका पैर फिसला
किसी ने पटाखें फोडने की शरारत कि थी
लाल रंग से लदे लोग बाहर अा गिरे
कुछ टुकडो में, कुछ पुरे के पुरे
हाँथ बढे, मदद मिली
दवाईंयाँ लगी, पट्टीया बंधी
वो खुद का दुखता पैर लिए देख रही थी
उस घुलन को
थोडी देर के लिए ही क्यों न हो
शहर को बाँटने वाली वो लकीर
मिट गई थी
उसे अच्छा लगाँ