Friday, September 28, 2018

उलझी बेल

मन बडा कच्चा
मृत्यू सब से सच्चा
ये जानकर भी हात से
खिलौना ना छुटे

मन बच्चेसा भागे
हातों कायनात माँगे
साधी रेत ना पकडी जाए
अौर अश्कों के समंदर बहाए

मन गिरहों का बाजार
सोचें किस से करता मै सच्चा प्यार
ये गिरह सुलझाने की कोशिश
बना दे नयी गिरहे हजार

मन भोला मन छोटा
इतनीसी मिट्टी का लोटा
पुरा भरने से खुश होता
पर अंजान ठिपकती बूँदो से

ये दुनियादारी ना समझा
ना समझा जीवन-मृत्यू का खेल
जिंदगी नक्षेदारी वक्त की
अौर ये उस नक्षेदारी मे उलझी बेल

Monday, September 24, 2018

ए सअादत!

तू ना रहा ये सही हुअा
बेशक तेरी कमी है मगर
दुनिया की जिल्लत से तू बच गया
ये सही हुअा

तेरे कलम उठाने की मजबूरी
शायद समझ सकता हूँ मै
वो तडप तेरी
वो कशीश तेरी
तेरे हर लफ्ज के किनारे टहलनेवाली
घुटन तेरी
चिंखें भी तो थी
उस हर इक पन्ने मे दबी हुई
काश वो उसे सुन सकते
काश हम भी उन्हें सुन सकते...
हम सदीयोंसे ऐसे ही है
बहरे, अंधे
बाहर से जलते
अौर अंदर से बुझे हुए

जब अहिंसा की अावाज देनेवाला
चिता पर लेट गया
जब देश को अाजाद करने की चाह मे
कोई बोस इतिहास मे खो गया
जब ऐसी कई अावाजे हमसे मायूस होकर
कायनात से जा मिली
तब कहीं जाकर हमे थोडासा एहसास हुअा
के भाई,
''शायद ये बंदा कुछ ठिक कह रहा था''
हम अक्सर बडी देर से होश मे अाते है...

तू जब था तब भी
जब तू न था तब भी
तेरे ठंडे गोश्त को नोंचनेवाले कम ना थे
पर तेरी कलम ना झुकी
तेरी अावाज ना बदी
कितना अच्छा हुअा के
हम लोगो मे उस वक्त वो ताकद ना थी
जो तेरी अावाज को दफना दे

पर तेरे अफसाने पढ़ते हुए
अाज कुछ डर सा लगता है
कहीं तेरी अाग से जला हुअा कोई टुकडा
दुनिया मे फिर से अाग लगाने की कोशिश ना करे
क्योंकी उस वक्त तुझ पर मुकद्दमे दायर करनेवाले
अाज हाथों मे चाकू लेकर सडकों पर घूम रहे है
ए सअादत! तू ना रहा वोही अच्छा है
अगर होता तो अाज मिटा दिया गया होता
जैसे हमने खुद के भीतर के इन्सान को

चुन चुन के मिटा दिया है...

Saturday, September 8, 2018

नई कहानी

तुने भेजी हुई किताब के कुछ पन्ने
कहानीसे जुदा होकार मेरी गोद मे अा गिरे है
उन गुमशूदा पन्नो की किस्मत देख
तेरी-मेरी कहानी याँद अाती है

किसी के कहानी से जुदा होने के जख्म
अल्फाजोंसे भी गहरे होते है सनम
गम कहानी से जुदा होने का नहीं
पर कहानीकों हमारी अब जरूरत ना रही
ये चुभन मिटाए नहीं मिटती

पन्ने अगर कहानी के हकदार ना हो
तो उनका जुदा होना ही ठिक है
पन्ने अगर कहानी के किरदार ना हो
तो उनका गुमशुदा होना भी ठिक है
पर ऐसे गुमशुदा पन्नो को
अाशने की तलाश मे दरदर भटकना नही चाहिए
अच्छा तो ये हो के वो कूट कर, जल कर, सड कर मिट्टी मे मिल जाए
क्योंकी,
मिट्टी की हर एक परत को दूर कर के
पेडो की जडो से उनकी नसो के रास्ते उपर चढ के
डाली पर फिर से उगने का हौसला रखते है पत्ते
एक किताब छुटी तो क्या हुअा
नई शाखाअोंकी किताबोंमे भी तो कहानियाँ होती है!