Friday, July 6, 2018

काँटा

बाँदलों की अाहट होती है
अंधेरा सा छाने लगता है
उनकी गड़गड़ाहट से पहले ही
अंदर कोई समंदर मचलने लगता है

बड़ी कोशिशो के बावजूद
दिल का चैन उड़ जाता है हवाँ पर
अाफ़ाक पर दिखने वाला तुफान
धीरे धीरे करीब अाता जाता है

दिल दिमाग से कर देता है बगावत
अौर बादलों से पार होती हुई
बड़ी ऊँची...अौर ऊँची होती जाती है
बेचैनीयों की मिनारें

दौडती साँसे हार जाती है शर्त
धड़कतें हुए दिल से
तब घुटन हजारों पैरो से
दिल की फर्श पर रेंगने लगती है
 उस सारी बेचैनी को समेट कर
पाँव के तले से कोई काँटा निकाला जाए
वैसी अंदर चुभती इक नज्म को
अल्फाजों के चिमटे से पकड कर
खिंच लेता हूँ बाहर
उसे किसी काग़ज में बांध कर
फेंक देता हूँ अंजान कोने मे
चैन की साँस लेते हुए...

अगर ये काग़ज ना होते ना...
तो ये नज्मे जिंदा नहीं रहने देती!

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