Wednesday, July 11, 2018

खामोशी

तुझे पता है...
इस वक्त रात बडी चुपचाप सी है
अौर आसमान भी खामोश है

अासमान यूँ बैठा है सामने
जैसे कोई हमदम
सीने मे कैद घुटन को
अाँखोसे बहा कर हो जाता है बेअल्फाज़
बिलकूल वैसेही,
इस वक्त खामोश है आसमान
और ये रात भी चुपचाप सी है...

अमावस की इस रात
सारे पहरों से दूर
बड़े अरसे के बाद मिल रहे है वो
सुकूनभरे काले सन्नाटे मे
जहाँ दर्द भरी अाह भी
कोहराम सी भाती है
इसीलिए तो चुपचाप सी है ये रात
अौर आसमान खामोश बैठा है...

रात अपने दामन से
हलके हलके पोंछ रही है
अासमान की नम अाँखे
खुद के रुख़्सार को नज़रअंदाज करते हुए
जो भीग रही है
बहते पल अौर बूँदे-ए-अश्क मे
अौर अासमान छोड रहा है
निला मयस्सर खुशहाल नकाब
तोहमत भरे काले रंग की ख्वाहिश मे
मशिय्यत पुरी हो फिर भी
सहर भर की ही देरी है

इसीलिए तो,
रंजीशभरा आसमान खामोश है
और ये रात भी अाज बड़ी चुपचाप सी है...

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