''ये तुम्हारी पेंटींग्स मुझे समझ मे नहीं अाती.''
''क्यों? क्या मै तुम्हारी कविताअों के बारे में कभी ऐसा कहता हूँ?''
''तुम उन्हें समझते कहाँ हो? तुम तो मेरे अल्फाजोंको खुदके मतलब दे देते हो. ये समझना थोडेही ना हुअा?''
''सही कहाँ! इसे समझना नहीं, अपना बनाना कहते है.''
''ऐसे तोडमरोड के! ये तो मनमानी हुई!''
''खुदमे ढ़ा लेना कहो! बरसात का पानी प्याले मे गिरे तो प्याले जैसा, समंदर मे गिरे तो समंदर जैसा... छोडो रहने दो! तुम ठहरी अल्फाजोंकी ऊँची इमारतों मे रहनेवाली. तुम लिखावट के अागें की असली दुनियाँ को क्या समझोगी?''
''क्यों? क्या मै तुम्हारी कविताअों के बारे में कभी ऐसा कहता हूँ?''
''तुम उन्हें समझते कहाँ हो? तुम तो मेरे अल्फाजोंको खुदके मतलब दे देते हो. ये समझना थोडेही ना हुअा?''
''सही कहाँ! इसे समझना नहीं, अपना बनाना कहते है.''
''ऐसे तोडमरोड के! ये तो मनमानी हुई!''
''खुदमे ढ़ा लेना कहो! बरसात का पानी प्याले मे गिरे तो प्याले जैसा, समंदर मे गिरे तो समंदर जैसा... छोडो रहने दो! तुम ठहरी अल्फाजोंकी ऊँची इमारतों मे रहनेवाली. तुम लिखावट के अागें की असली दुनियाँ को क्या समझोगी?''
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