Saturday, June 30, 2018

बेदर्द बारीश

ये बेदर्द बारीश फिर से अा पहुँची है

फिर सुनाई दे रही है
उसकी बूँदो की अावाज
बिखर रहे है रंग अाफ़ाक पर
खामखा ही...

बेरंग जिंदगी की हसरतों को डुबोती हुई
ये बेदर्द बारीश फिर से अा पहुँची है...

अभी अभी इक नज्म को तराश कर
साँस ली थी मैने
उस नज्म के पैदा होने की वो गिली वजह
अब तक बिछी है बाहरकी जमीन पर

मै इन्तजार मे था उस वजह के मिट जाने की
ना जाने क्यों,
ये बेदर्द बारीश फिर से पहुँची है...

शहद की मक्खीयों से कुछ अल्फाज
मेरे ईर्दगिर्द मंडरा रहे है
उनकी सरगोशीयो से कुछ फुल
ताबूत से बाहर अा रहे है

सोचा था के कुछ देर बैठ लू बिलकूल तनहा
लेकीन,
ये बेदर्द बारीश फिर से पहुँची है...

अरमोनों-यादों-एहसासों का मेला
लग रहा है कही अंदर
पुराने-धुंदले ख्बाबों का
मानो घूम रहा है बवंडर

पिछे मुड के ना देखूँ ये तै कर लिया था मैने
पर अाखिरकार,
ये बेदर्द बारीश फिर से पहुँची है...

अब फिर से किसी नज़्म की अाहट
करने लगी है परेशान
अंगडाई ले रही है
मेरे दर्द की जुबान

ख्याल था के कभी रूबरूँ ना होऊंगा खुद से
पर ये बेदर्द बारीश फिर से अा पहुँची है

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