ए शायरा
चलो तो फिर शब्बा खैर...
आज कम्बख्त निंद वक्त से बहोत पहले आ पहुंची है
मेरे तकीए से नजदीक जो अंधेरा कोना है, वहॉं खडी है वो
थोडी रूठी है शायद मुझसे.
कुछ शिकायत सी है उसके चेहरे पे
मानो कह रही हो के,
"कितने उलझे रहते हो अपने काम मे! मुझे थोडा सा भी वक्त नही देते?"
बात तो सच है!
कहा वक्त दे पाता हूँ आज कल मै उसे?
हर रात जब मै अपनी किताबो मे खोया रहता हूँ,
तब वो मेरे सिरहाने बैठी रहती है.
ना जाने इंतेजार के कितने इम्तिहान पार कर ले उसने?
मेरी राह देखते देखते वो खुद ही सो जाती है
और मै जगा रहता हूँ उसकी बंद पलको को देखते हुए...
क्या निंद को भी सपने आते होंगे?
इसी लिए आज वो वक्त से पहले ही आ पहुची हैं.
उस की ऑंखो मे एक छोटीसी दरख्वास्त हैं
मानो कह रही है के,
"आज तो रेहने दो!"
उसका दिल तोडने का दिल नही कर रहा
सोच रहा हूँ, आज कुछ वक्त दे ही दू...
खुद को!
चलो तो फिर शब्बा खैर...
आज कम्बख्त निंद वक्त से बहोत पहले आ पहुंची है...
चलो तो फिर शब्बा खैर...
आज कम्बख्त निंद वक्त से बहोत पहले आ पहुंची है
मेरे तकीए से नजदीक जो अंधेरा कोना है, वहॉं खडी है वो
थोडी रूठी है शायद मुझसे.
कुछ शिकायत सी है उसके चेहरे पे
मानो कह रही हो के,
"कितने उलझे रहते हो अपने काम मे! मुझे थोडा सा भी वक्त नही देते?"
बात तो सच है!
कहा वक्त दे पाता हूँ आज कल मै उसे?
हर रात जब मै अपनी किताबो मे खोया रहता हूँ,
तब वो मेरे सिरहाने बैठी रहती है.
ना जाने इंतेजार के कितने इम्तिहान पार कर ले उसने?
मेरी राह देखते देखते वो खुद ही सो जाती है
और मै जगा रहता हूँ उसकी बंद पलको को देखते हुए...
क्या निंद को भी सपने आते होंगे?
इसी लिए आज वो वक्त से पहले ही आ पहुची हैं.
उस की ऑंखो मे एक छोटीसी दरख्वास्त हैं
मानो कह रही है के,
"आज तो रेहने दो!"
उसका दिल तोडने का दिल नही कर रहा
सोच रहा हूँ, आज कुछ वक्त दे ही दू...
खुद को!
चलो तो फिर शब्बा खैर...
आज कम्बख्त निंद वक्त से बहोत पहले आ पहुंची है...
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