ए शायरा,
अाप लिखते रहें युहीं
तो हमसे भी बरसती रहेंही कुछ छिंटें अल्फाजो की
सुना है बडे घने पेडों के सहारे
छोटी छोटी बेलें बढाँ करती है...
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अपनी मिटटी अपना बींज
खुद तराशो जनाब
अपने फंक अपने हुनर पर
थोडा ऐतबार खुद फर्माव बरखुद्दार
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अाप लिखते रहें युहीं
तो हमसे भी बरसती रहेंही कुछ छिंटें अल्फाजो की
सुना है बडे घने पेडों के सहारे
छोटी छोटी बेलें बढाँ करती है...
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अपनी मिटटी अपना बींज
खुद तराशो जनाब
अपने फंक अपने हुनर पर
थोडा ऐतबार खुद फर्माव बरखुद्दार
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