Saturday, June 23, 2018

शुक्रीया

अाज ईद के मौके पर जब तेरे दोनो हाथ उपर उठेंगे मुझे यकीन है तेरी दुअा मे दुसरों का नाम होगा

अौरो की कहानीयों मे
खुद को भूल जाना
ये अासान बात नही होती
खुद से जुदा होना
अौर फिर अौरो का हो जाना...
क्या पाक रूह पाई है तुने!

दर्या के कई रंग 
तुझमे नजर अाते है मुझको 
तू खामोश बहती
किनारो की बाते सुनती
शाद, पर चुपचाप सी...

तेरे पानी मे जो अक्स है
उसमे भी
तेरे अपनो के साये है
पर तू नही
तू कही नही!

ये तेरा होकर भी ना होना
या फिर किसी का राजदार बन जाना
ये चार चाँद है सारे
तेरे वजूद पे लगे हुए

तू मिट्टी सी घनी
पहली नर्म बारीश सी प्यारी
या फिर तू है शाम-ए-रंगीन
घर लौंटनेवाले पंछीयों को
सहलाती हुई...
 
काश मै भी तेरी तरह खुद से परे देख पाऊँ
काश मै भी तेरे कुछ रंग ओढ पाऊँ
तुझ मे मेरा अक्स नजर अाता ही है
काश मै भी तेरा अक्स बन जाऊँ

ए दोस्त... 
अब अौर क्या कहूँ?
बस्स!
शुक्रीया... तेरा होने का

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