चाय का कप लेकर खिडकी मे खडा था
बाहर कोई भूली बिसरी बारीश
बडे जोरो से बरस रही थी
अंदर की दिवारों तक पहुँच रही थी उसकी ठंड
मै गर्माहट के लिए चद्दर ढूँढ रहा था
तभी किसी की अाहट हुई!
'इतनी बारीश मे कौन अा सकता है?'
मैने दरवाजा खोला
बाहर इक भिगी हुई नज्म खडी थी!
थोडी सहमी सी
थोडी बोंखलाई हुई
मानो अाईना हो कोई
दिखने मे थी कुछ धुंदली धुंदली
शायद मेरे चष्मे धुंदले हो गए थे
गर्म चाय की वजह से
बिना बुलाए अंदर अा गई वो
घर के कोने कोने पर
नजरों के हाँथ फेरती हुई
जब हाँथ कुछ ना लगा
तो इक कुर्सी मे बैठ गई
वो अाई तो बाहर से अंदर तक
पानी की एक लकीर बन गई थी
मै पोंछा लेके दौडा
उसने कहाँ,
''पहली बार ही तो अंदर अाई है बूँदे!''
वो अावाज बिलकूल मेरे जैसी थी
उस अावाज मे मेरा बचपन था
लडकपन था, जवानी भी थी
कुछ घने, सफेद बादल भी थे
उसके धुंदलेपन के पिछे कुछ धुंडते हुए पुँछा मैने
''कैसे अाना हुअा?''
नजरों के कुछ पल गुजरे
फिर अावाज अाई,
''मुकम्मल जहाँ की तलाश किसे नही होती?''
बारीश बढ रही थी
बूँदे खिडकी से अंदर अाई
उनकी छुअन से
गिरह गिली हो रही थी
जोरो की हवाँ चली
सरसराहट सुनाई दी मेरे पुराने, खाली कागज़ोंकी
वो अावाज सवाल बनकर मेरे चेहरे पे बिखर गई
अौर सामने कुर्सी पे बैठे हुए
शायद जवाब मुस्कुरा रहा था
वो नंगे पैरो से पानी की लकीर खिंचती हुई
मेरे करीब अाई
उसके बदन से टपकनेवाली बूँदे
चिंटीयों सी सरसर चढ रही थी मुझपर
चंद साँसो के फाँसले पर उसकी नर्मसार नजर
मेरी अापबिती को छुती हुई
मुझमे पिघलती रही...
कुछ कुरेदती रही...
...बाहर तुफान उमड पडा था!
अब नज्म साफ दिख रही थी
कही पुराने टूटे किले थे
कही अनकहे अफ़साने
कही शबनम थी, तो कही तबस्सूम
बूँद बनके गिरी वो कागज पर
अब धीरे धीरे फैल रही है
इक भिगी हुई नज्म
अर्से के बाद मुझे से पैदा हो रही है
बडें दिनो के बाद ये नज्म
अाज फिर से गिली हो रही है...
बाहर कोई भूली बिसरी बारीश
बडे जोरो से बरस रही थी
अंदर की दिवारों तक पहुँच रही थी उसकी ठंड
मै गर्माहट के लिए चद्दर ढूँढ रहा था
तभी किसी की अाहट हुई!
'इतनी बारीश मे कौन अा सकता है?'
मैने दरवाजा खोला
बाहर इक भिगी हुई नज्म खडी थी!
थोडी सहमी सी
थोडी बोंखलाई हुई
मानो अाईना हो कोई
दिखने मे थी कुछ धुंदली धुंदली
शायद मेरे चष्मे धुंदले हो गए थे
गर्म चाय की वजह से
बिना बुलाए अंदर अा गई वो
घर के कोने कोने पर
नजरों के हाँथ फेरती हुई
जब हाँथ कुछ ना लगा
तो इक कुर्सी मे बैठ गई
वो अाई तो बाहर से अंदर तक
पानी की एक लकीर बन गई थी
मै पोंछा लेके दौडा
उसने कहाँ,
''पहली बार ही तो अंदर अाई है बूँदे!''
वो अावाज बिलकूल मेरे जैसी थी
उस अावाज मे मेरा बचपन था
लडकपन था, जवानी भी थी
कुछ घने, सफेद बादल भी थे
उसके धुंदलेपन के पिछे कुछ धुंडते हुए पुँछा मैने
''कैसे अाना हुअा?''
नजरों के कुछ पल गुजरे
फिर अावाज अाई,
''मुकम्मल जहाँ की तलाश किसे नही होती?''
बारीश बढ रही थी
बूँदे खिडकी से अंदर अाई
उनकी छुअन से
गिरह गिली हो रही थी
जोरो की हवाँ चली
सरसराहट सुनाई दी मेरे पुराने, खाली कागज़ोंकी
वो अावाज सवाल बनकर मेरे चेहरे पे बिखर गई
अौर सामने कुर्सी पे बैठे हुए
शायद जवाब मुस्कुरा रहा था
वो नंगे पैरो से पानी की लकीर खिंचती हुई
मेरे करीब अाई
उसके बदन से टपकनेवाली बूँदे
चिंटीयों सी सरसर चढ रही थी मुझपर
चंद साँसो के फाँसले पर उसकी नर्मसार नजर
मेरी अापबिती को छुती हुई
मुझमे पिघलती रही...
कुछ कुरेदती रही...
...बाहर तुफान उमड पडा था!
अब नज्म साफ दिख रही थी
कही पुराने टूटे किले थे
कही अनकहे अफ़साने
कही शबनम थी, तो कही तबस्सूम
बूँद बनके गिरी वो कागज पर
अब धीरे धीरे फैल रही है
इक भिगी हुई नज्म
अर्से के बाद मुझे से पैदा हो रही है
बडें दिनो के बाद ये नज्म
अाज फिर से गिली हो रही है...
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