रिश्तो की डोर से इक नक्काशी बुनना चाहता हूँ
अगर उलझ भी गई तो धीरे से सुलझाना चाहता हूँ
माना के दुनिया भरी है काँटो से
फिर भी...
इक रेशमी नशेमन इन हाँथो से बनाना चाहता हूँ
अगर उलझ भी गई तो धीरे से सुलझाना चाहता हूँ
माना के दुनिया भरी है काँटो से
फिर भी...
इक रेशमी नशेमन इन हाँथो से बनाना चाहता हूँ
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