Friday, June 22, 2018

घर

मेरे बिस्तर पर फैली हुई बिना सिलवटो की चद्दर
मुझे घुर रही है
अौर मै उस नजर से मूँह छुपाता हुअा
खिडकी से बाहर देख रहा हूँ

''तो कब अायेगी वो?''
बिस्तर से सवाल अाता है
मुझे अल्फाज नही मिलते
अंदर बहोत शोर है
मै खुदही खुद को सुन नही पाता
उसे क्या बताऊँ?

मै बाहर के कमरे मे चला जाता हूँ
टीव्ही के शोर मे घुल जाने की एक उम्मीद है
तभी...
दिवार पर टंगी हुई इक पेंटींग
अाँखो मे चुभने लगती है...

''ये तुम्हारे लिए... मेरी तरफ से''
वो पेंटींग लेकर अाई थी सामने
रंग कुछ अजिब थे, रेखाँए भी थी टेडीमेढी
पर उस छोटेसे हरभरे घरोंदे के पिछे
जो खामोश पर्बत था ना
उसके पिछे...
बहोत बहोत पिछे...
बहोत दूर... कुछ था
मै वो देख ना सका
हाय मै वो देख ना सका!

मै रसोईघर पहुँचा
पानी का मटका
कचरे का डिब्बा
स्टँड से झुलते छोटे छोटे चम्मच
फ्रिज पर रखी हुई हम दोनो की तस्वीर
उसने बडे चाँव से बुना हुवा तरकारी का थैला
हर इक के लबोंपर खामोश सवाल थे
अौर मै बिना जवाँबो का फकीर
अंदर कैसे जाता?

पिछे मुडते समय
टपकते हुए नल की अावाज अाई
मुझे पता है वो अभी खत्म हो कर चूप हो जाएगा
जादा कुछ बचा नही है उसके अंदर
जानता हूँ मैं

मैने बिना रोशनी के दिये बंद कर दिए
जिनसे दुनिया का अाखरी लम्हा दिखता है
उन खिडकीयों पर परदे अोढें
पैरो मे चप्पल पहनी
घर से बाहर निकला

अब मै दुनिया घूम सकता हूँ
लेकिन घर वापस नही अा सकता
क्यूँकी निकलते वक्त जब दरवाजा बंद किया था
तब याद अाया था की चाबी अंदर ही रह गई है...

2 comments:

  1. सुबहान अल्लाह.....
    क्या कर रहे हो तुम यार... कितनी खुबसुरत हैं ये नज्म..क्या कुछ महसूस नही किया मैने, रुह तक ले गये नज्म के..!!! यूंही बेकरार रहो..लिखते रहो मियां.. और हमे युंही आबाद करते रहो.. अल्लाह तुम्हे ऐसी बेचैनी नवजाते रहे.. आमीन!

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    1. हाय! क्या दुअा है!
      'अल्लाह तुम्हे ऐसी बेचैनी नवाजते रहे'
      बहोत बहोत पसंद अायी.

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