Sunday, June 24, 2018

माँफ किजिएगा!

माँफ किजिएगा!
कुछ गलतीयाँ हुई है मुझसे

जाने-अंजाने
वक्त के किनारे
लम्हो की रेत फिसलती गई
मेरे नादान हाथों से...

रेत के उन जर्रो को
रेगिस्तान में ढूँढ रहा हूँ
सोचता हूँ माँफी माँग लू उनसे
खुद जर्रा होकर मिट्टी होने पहले

माँफी...

उन सारे अल्फाजो से
जो मैने कभी लिखे नही
वो ताकते रहे मेरे कलम की अाहट
पर कभी मुकम्मल ना हुए

उन सारे खतों से
जो मैने कभी पुरे नही किए
उनके अधुरेपन के कर्जे तले
किश्तो मे खत्म हो रही है मेरी जिंदगी

उन सारी कहानियों से
जिन्हे मैने कभी अंजाम ना दिया
उन सारे किरदारों से भी
जिनकी रूह बिना जिस्म के तडपती रही

उन सारी नज्मो से
जिन्हे मैने पैदा होने से पहले ही कत्ल कर दिया
अब इन लहुलुहान हाँथो से
पैदा होने को इन्कार करती है नई नज्मे

उन सारी शिकायतों से भी
जिन्हे किसी के सामने ना रखा
वो दबी, सहमी, नाराज शिकायतें
अाज खडी है मेरे सामने नासूर बनके

उन सारी प्यारी गलतीयों से भी
जो की शायद मैने की होती
ये डरा डरा, खौफ से भरा भरा दिल
उन गलतीयों को देख कर अाज भी ललचाता है

उस हर एक साँस से
जो तेरी हर याद पे थम जाती थी
उम्र बिती, पर उन साँसो को मायने ना मिले
काश वो थम जाती... हमेशा के लिए

उस हर इक शाम से
जो मेहफिलों के शोर मे
मेरी वजह से तनहा गुजरी...
अब वो तनहाई सन्नाटा बन कर छाई है

उन सारे अनछुए लम्हों से
जिन्हे मैने खुशीं का एहसास ना होने दिया
अाज वही लम्हे दूर खडे होकर
मुझपर ठहाँके लगाते है

मै माँफी माँगता हूँ उन सारे गुनाहो से
जो मुझे करने चाहिए थे
अगर कर लेता, तो गुनेहगार के तौर पर ही सही...
मेरा कोई वजूद तो होता

मै माँफी माँगता हूँ खुद से
के काश मैने तुम्हे जिने दिया होता
काश थोडा मै भी जी लेता...

माँफ किजिएगा!
कुछ गलतीयाँ हुई है मुझसे

कुछ सुराख छोडे है उन गलतीयोंने
दिल-ए-अर्श मे
अब तो उनकी लर्जिश भी सुनाई दे रही है
मेर अर्श का जर्रा जर्रा बिखरने से पहले
अाप सब की माँफी माँगना चाहता हूँ

माँफ किजिएगा!
कुछ गलतीयाँ हुई है मुझसे...

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