छोडो!
अाज तेरे मेरे वक्त की सुईंया
इकदुसरे से खफाँ है शायद
दोनो का रूख इतना अलग मालूम पडता है
के मिलने को तय्यार ही नही...
---
छोडते तो हम कुछ भी नहीं
आसान थोडी हैं यूं रूख बदलना...
बातें मुलाकातों में
जरुरी होती हैं
ये मीठी मीठी रूकावटे
---
रूकावटों से शिकायत नहीं
लेकीन ये तजुर्बाह है के
तखय्युल की शबनम
वक्त की लंबी राहों पर
अक्सर मुरझाया करती है
अापसे गुफ़्तगु करने के बहाने
वैसीही इक ताजा बूँद-ए-शबनम ले अाए थे
पर वक्त की सुईयोंका तअस्सूर भी ऐसा
की हमारी मशिय्यत बेबस हो गई...
चलीए... फिर कभी!
---
अजी जनाब,
ये कैसी बात की
खयालों के मुरझाने की
जेहन से मिटने की
रुह हैं हमारे बातचीत की
उन्हे महफूज कर लो
थोडा खयाल कर लो..
वैसे सुना है
बडी लज्जतदार होती हैं
वह गुफ्तगू जो धीमे आचपर
पकती हैं..
तो कह दो अपने खयालों से
जरा पकले वक्त की भाप पे
तखलिक के चुल्हे पर
कोई बडे चाव से इंतजार मे है उस अजीज खयाल के
दूसरी छोर पे..
अाज तेरे मेरे वक्त की सुईंया
इकदुसरे से खफाँ है शायद
दोनो का रूख इतना अलग मालूम पडता है
के मिलने को तय्यार ही नही...
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छोडते तो हम कुछ भी नहीं
आसान थोडी हैं यूं रूख बदलना...
बातें मुलाकातों में
जरुरी होती हैं
ये मीठी मीठी रूकावटे
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रूकावटों से शिकायत नहीं
लेकीन ये तजुर्बाह है के
तखय्युल की शबनम
वक्त की लंबी राहों पर
अक्सर मुरझाया करती है
अापसे गुफ़्तगु करने के बहाने
वैसीही इक ताजा बूँद-ए-शबनम ले अाए थे
पर वक्त की सुईयोंका तअस्सूर भी ऐसा
की हमारी मशिय्यत बेबस हो गई...
चलीए... फिर कभी!
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अजी जनाब,
ये कैसी बात की
खयालों के मुरझाने की
जेहन से मिटने की
रुह हैं हमारे बातचीत की
उन्हे महफूज कर लो
थोडा खयाल कर लो..
वैसे सुना है
बडी लज्जतदार होती हैं
वह गुफ्तगू जो धीमे आचपर
पकती हैं..
तो कह दो अपने खयालों से
जरा पकले वक्त की भाप पे
तखलिक के चुल्हे पर
कोई बडे चाव से इंतजार मे है उस अजीज खयाल के
दूसरी छोर पे..
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