तुम यूँ साड़ी पहनकर हात फैलाए
झूठी-सच्ची हँसी लेकर गुज़र ज़ाती हो भीड़ से
कमलपत्ते पर पानी की बूँद चलती हो ज़ैसे
तू ये कैसे करती है बता?
तू कितनी सूख़ ज़ाती होगी रे अंदर से?
मै तुझे बाहों मे भरना चाहता हूँ इक बार, बड़े प्यार से...
और चुराना चाहता हूँ तेरी थोड़ी हँसी
जो कर्ण की कवचकुंडल की तरह अभेद्य लगती है मुझे
अब की बार तुझे मिलूँगा, तो ये करुंगा जरुर...
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