Tuesday, February 7, 2023

ये तेरी मेरी कहानी

तेरा मेसेज मिला. अरसो बाद!

इस रात के सन्नाटे मे तेरी आवाज कितनी अलग लगती है! कानो के इतने नज़दिक... मुझे गुदगुदी सी होती है. तू यहाँ थी, तब भी मेरे कानो मे यूही बोला करती थी. और ये तेरी आवाज के पीछे टिक टिक करनेवाली (शायद दिवार की) घड़ी! हाथों से छुटते पलो की तरफ़ सुई से इशारा करती हुई...

जब तुने वो नज़्म मोबाईल पर रिकॉर्ड कर के मुझे भेजी, तब मै चौक गया था. मै मेरी कहानीयाँ तुझे अक्सर भेज़ा करता था. उन के बारे मे तो तुने कभी कुछ बोला नहीं! फिर आज़ ही चुप्पी क्यों तोड दी?

पर तेरी नज़्म बड़ी पसंद आयी मुझे. कितना कुछ कह दिया उस ने! मानो किसी ने मेरे अंदर की बेबसी को लफ़्जो से खिंच कर बाहर निकाला हो.

तेरी नज़्म जो बयान करती है वो सच तो है. ये कहानीयाँ सच मे तकलीफ़ पहुँचाती है. तू भी तो ज़ानती है!

मुझे कभी कभी मेरे तख़य्युल से बड़ा ड़र लगता है. ना ज़ाने कब कैसी कहानी और कैसे किरदार पेश कर दे! फिर उन कहानियों को ले कर ज़ीना पड़ता है. मरना भी पड़ता है. किरदारो का बोझ उठाते उठाते कुली बन जाता हूँ. वो जहाँ ले जाते है वहाँ चला जाता हूँ. वो जहाँ मुडे वहीं मूड भी जाता हूँ.

क्यों करता हुँ ये? शायद अच्छा लगता है मुझे ये, या शायद ज़रुरत है मेरी. इस जिंदगी के ऐसे कितने पल है जो मै जी न सका, शायद इस के आगे भी कभी ज़ी ना पाऊं. वो, ज़ो मै कभी हो न सका, उस मै की तलाश मे इन किरदारो के साथ ख़ानाबदोश की तरह फ़िरता रहता हूँ. उस पल की तलाश मे, जो मुझे पुरा कर दे. क्या ऐसा कोई पल दुनिया मे है?

फ़िर ये किरदार सहारा बन जाते है मेरा. इन के साथ छुटे पल ज़ीने की नाकाम कोशिश करता हूँ.  कोई ख़ुशी या सुकून ढुंढ भी लू तो वो मिलता भी कितना है? बस पलभर का... उस एक पल से दिल का गुज़ारा नहीं होता. ना दिल भरता है - ना संभलता है. बस चकनाचूर हो कर उन सारे जिये पलो मे तिनके तिनके मे बटता रहता है...

क्या उस इक पल की ज़िंंदगी के लिए इतनी ज़द्दोज़हद ठिक है?

क्या कोई सिर्फ एक कहानी तेरी-मेरी मर्जी की नहीं हो सकती?

इन्ही कहानियों से पैदा हुए ये भगवान, ज़िज़स या ख़ुदा... इन मे से किसी के पास भी दिल नहीं?

सच कहा है तुने! कहानिया तकलिफ़ जरूर देती है. पर फ़िर भी इन्हें लिख़ता रहता हूँ. अब यही वज़ह बन चुकी है मेरे ज़ीने की. तकलिफ़ दे या सुकून, ज़हन मे पैदा होनेवाली अगली कहानी का, अगले किरदार का इंतज़ा तो होता ही है मुझे! एक इंतज़ार ये भी है के कोई कहानी लिख़ते लिख़ते मै भी पुरा हो जाऊ...

तू सात समंदर पार दुनिया के किसी कोने मे बैठ कर मेरी कहानीयों का यू नज़्मो मे ज़वाब दे रही है, मानो मैने कोई चिठ्ठी लिख़ी हो तुझे!

अब तुने चुप्पी तोड़ ही दी है तो फ़िर बता! कहा ले जाए ये तेरी-मेरी कहानी? बनेगी मेरी कहानी का किरदार? या ये कहानी लिख़ कर करेगी मुझे पुरा?

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ये अगर खत होता तो कह देती किसी रोज मैने कहा ही था,

तुम कहानी लिखो तो मुझे ज़रूर लिख़ना. मेरे होने के कई रंग तुम से बेहतर कहाँ किस ने ज़ाना है और कहाँ किसी ने तुमसे बेहतर मुझे पढा है। तुम्हारी कहानी में मैं बिलकुल मैं रहूँगी, पानी की तरह, न मेरा कोई एक आकार न रूप न रंग न मुझे बहने से रोका ज़ा सकता है न मुझे हवा बनने से न फिर बारीश की तरह बरसने से। मेरे किरदार की रोचकता तुम्हारे नोन जजमेंटल अप्रोच में है।  बिना किसी प्रिज्युडाईसेस से सिर्फ तुम समझ सकते हो, तो तुम मुझे जरूर लिखना।  मेरे कही-अनकही से, मेरी सोच और धारणाओं से तुम जैसे मिल पाए उतनी तो कोशीश किसीने मुझ से भी मिलने की नहीं की। ☺️

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