दुनिया के दस्तूरों की उलझन न थी
दोराहे मिलते, पर दिल मे सवाल न थे
मुश्किल घडी मे परेशानी न थी
सही-गलत चुनने की कश्मकश भी तो न थी
चाहें जो भी हो
तू सब कुछ सही कर देती है
ये भरोसा था
अब भी है
बस अब तू नही
अब दुनिया के ये दाँवपेच बडे चुभते है
सिधी राह ढूँढे नही मिलती
कदम डगमगाते है
कडी धूप मे डूबने के डर लगा रेहता है
वैसे सब कुछ ठिक है
पर कुछ भी ठिक नही
पता नही क्या? क्यू? कैसे?
...
काश, तू होती तो समझाती
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