Saturday, December 24, 2022

छाँववाली कहानी

ये शाम आज कुछ नर्म सी है
दिल भी गुमसूम सा है
बीते दिनो के पंछीयों को भी
आज ही आना था?

पुरानी अलमारी खुली
कुछ चिठ्ठीयाँ गिरी निचे
ये वही है,
मैने तुम्हारे पते पर भेजी हुई नन्ही चिठ्ठीया
जिन्हे बिना पढे, कोई मेरे पते पर छोड गया था
जब भी अलमारी का दरवाजा खुलता है
हर बार इसी तरह भागकर आ जाती है...
इन्हे लगता है कोई पढनेवाला आ गया
किस मूँह से बताऊ इन्हे, के तुम लावारीस हो?

क्या तुम्हे पता है?
जो चिठ्ठीयाँ जवाब नही लाती
उन्हे कभी छाँव नही मिलती!
उन चिठ्ठीयों को लिखनेवाले कलम भी
जिंदगीभर नासमझा बोझ लिए घुमते रहते है
शायरी करते है, कहानीयाँ भी लिखते है
बस, फिर कभी चिठ्ठी नही लिख पातें

नर्म शाम अंधेरे मे और उलझती गई
मुझे खामोश बैठा देख कुछ चिठ्ठीया पास आई
उन ताकते लफ्जो ने धीरे से सवाल पुछाँ
ये छाँव कैसी होती है?
सवाल सुन कर दराज मे पडा हुआ कलम
अंदर ही अंदर सिकुडतासा गया
बीते दिनो के पंछी भी
चुपचाप से हो गए
मैने भी धीरे से अपने झुलसे हुए पैर छिपा लिये
और चिठ्ठीयोंको इकठ्ठा कर के
मै छाँववाली कहानी सुनाने लगा...

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