छू ले मुझे कोई, इक पल के लिए सही
इक बार तो कोई कह दे, के मै रुक जाऊ यही
जर्रा जर्रा है तडपता, कोई पुकार तो ले
कोई तो अपना बना ले या, कोई रुठे तो सही
बारीशे आई-गई, पर इक बूँद भी नसीब नही
मै हूँ दरीया फिरभी क्यूँ, ये प्यास मिटती नही?
क्यों ये दुनिया पुछे मुझसे मुस्कूराहट का पता?
इन नकाबों की चहक मे, अश्क छिपे है कई
उडता हूँ खामोश, इस आसमान के तले
रुकना चाहूँ पर कही, मेरा घरोंदा ही नही
तेरा इंतजार है मुझे, जनम जनम से
कोई तो आए - पुछे, मेरी तबीयत ही सही
कोई तो झगडे किसी बात पे या फिर मना ले मुझे कोई
खामोशीयों के ये दौर, खत्म कर दे कोई,
कोई तो बैठे मेरे पास, सहलाए मुझे - या ये आँखे पढ ले कोई
इक बार तो कोई कह दे, के मै रुक जाऊ यही
तू दिखे धुंदली धुंदली सी, जैसे खडा कोहरे मे कोई
क्या तुम ही हो वो 'मेरी कोई', या फिर तू भी वो नही?
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