ज़ब घनी रात मे
तुम्हारी आँख़ ख़ुलती है
तुम अपने घर मे नहीं
मेरे सपने मे होती हो
तब सच सच बताना
कैसा लगता है तुम्हें?
उस अंधेरे मे जलते हुएदीपक देख़ती हो
जो तुम्हारी ही यादों सेजलते रहते है
उस रोशनी मे तुम्हे
मेरे दिल तक ज़ानेवाला रास्तादिख़ाई देता है
सच सच बताना,
कैसा लगता है तुम्हे?
तुम मेरे दिल तक आ करदस्तक देती हो
और ज़ाग ज़ाता हूँ मै
अपने बिस्तर पर
कुछ लिख़ कर भेज़ दिया करता हूँ तुम्हे
तुम वो वहाँ पढ लेती हो
यूँ एक ही वक्त़ मे दो ज़गह मौज़ूद होना
मेरे जि़स्मो-ज़हन पर छा ज़ाना
बताओ तो जरा,
कैसा लगता है तुम्हे?
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