कई साल पहले
किसी शाम
अॉफिस से निकले हुए चार कदम
रेल्वे स्टेशन के बजाए कही अौर मुडा करते थे...
चाय की प्यालीया
मकई के वडे
किताबों की कतारे
थिएटर की सिढीयाँ
हर जगह पर वो कदम
अपनी परछाई छोड जाते थे
चाय तो अब भी मिलती है
वडा आज भी बहुत बिकता है
किताबों की कतारें बढती रहती है
अौर पिक्चरे आज भी जोरो से चलती है
बस वो परछाईंया नही दिखती...
क्या करे
छाँववाली धूप भी तो बहुत है!
No comments:
Post a Comment