वो सालों से दौड रही थी
लोगो के बिचों बिच
अपनी पटरीओं से
लोगो के बिचों बिच
अपनी पटरीओं से
शहर दो हिस्सो में बाँटती हुई
इक तरफ़ अमीर लोग रहते
दुसरी तरफ अधमरे इन्सान
पहले दर्जे के लोग मुँह मोड कर
इस तरफ चले जातें
बाकी के डिब्बो के लोग
इस तरफ अाने की अास लिए
दुसरी तरफ अधमरे इन्सान
पहले दर्जे के लोग मुँह मोड कर
इस तरफ चले जातें
बाकी के डिब्बो के लोग
इस तरफ अाने की अास लिए
पैरो को खिंचखिंच के चले जाते
उस तरफ...
ज्यादा भिड हो जाए तो पहले दर्जे के लोग
उस तरफ के लोगो को भलाबुरा कहते
पहले दर्जे की खाली जगाए देख कर
उस तरफ वालो कि मुँह से निकल जाती गालियाँ
उस दोनो तरफो मे कभी कभी बाँते होती
कोई पहचान का चेहरा दिखें तो हात हवाँ मे उठते
कभी कबार अाँखे टकरा जाए
तो चेहरे पे अा जाती कुछ लुभावनी लकीरे
वो हर रोज दोनो तरफों के बिच से गुजरती
देखती
सोचती
एक दिन उसका पैर फिसला
किसी ने पटाखें फोडने की शरारत कि थी
लाल रंग से लदे लोग बाहर अा गिरे
कुछ टुकडो में, कुछ पुरे के पुरे
उस तरफ...
ज्यादा भिड हो जाए तो पहले दर्जे के लोग
उस तरफ के लोगो को भलाबुरा कहते
पहले दर्जे की खाली जगाए देख कर
उस तरफ वालो कि मुँह से निकल जाती गालियाँ
उस दोनो तरफो मे कभी कभी बाँते होती
कोई पहचान का चेहरा दिखें तो हात हवाँ मे उठते
कभी कबार अाँखे टकरा जाए
तो चेहरे पे अा जाती कुछ लुभावनी लकीरे
वो हर रोज दोनो तरफों के बिच से गुजरती
देखती
सोचती
एक दिन उसका पैर फिसला
किसी ने पटाखें फोडने की शरारत कि थी
लाल रंग से लदे लोग बाहर अा गिरे
कुछ टुकडो में, कुछ पुरे के पुरे
दोनो तरफ से दौड लगी
हाँथ बढे, मदद मिली
दवाईंयाँ लगी, पट्टीया बंधी
वो खुद का दुखता पैर लिए देख रही थी
उस घुलन को
थोडी देर के लिए ही क्यों न हो
शहर को बाँटने वाली वो लकीर
मिट गई थी
उसे अच्छा लगाँ
हाँथ बढे, मदद मिली
दवाईंयाँ लगी, पट्टीया बंधी
वो खुद का दुखता पैर लिए देख रही थी
उस घुलन को
थोडी देर के लिए ही क्यों न हो
शहर को बाँटने वाली वो लकीर
मिट गई थी
उसे अच्छा लगाँ
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