Thursday, October 6, 2022

लकीर

वो सालों से दौड रही थी
लोगो के बिचों बिच
अपनी पटरीओं से
शहर दो हिस्सो में बाँटती हुई
 
इक तरफ़ अमीर लोग रहते
दुसरी तरफ अधमरे इन्सान

पहले दर्जे के लोग मुँह मोड कर
इस तरफ चले जातें
बाकी के डिब्बो के लोग
इस तरफ अाने की अास लिए 
पैरो को खिंचखिंच के चले जाते
उस तरफ...

ज्यादा भिड हो जाए तो पहले दर्जे के लोग
उस तरफ के लोगो को भलाबुरा कहते
पहले दर्जे की खाली जगाए देख कर
उस तरफ वालो कि मुँह से निकल जाती गालियाँ

उस दोनो तरफो मे कभी कभी बाँते होती
कोई पहचान का चेहरा दिखें तो हात हवाँ मे उठते
कभी कबार अाँखे टकरा जाए
तो चेहरे पे अा जाती कुछ लुभावनी लकीरे

वो हर रोज दोनो तरफों के बिच से गुजरती
देखती
सोचती

एक दिन उसका पैर फिसला
किसी ने पटाखें फोडने की शरारत कि थी
लाल रंग से लदे लोग बाहर अा गिरे
कुछ टुकडो में, कुछ पुरे के पुरे
 
दोनो तरफ से दौड लगी
हाँथ बढे, मदद मिली
दवाईंयाँ लगी, पट्टीया बंधी
वो खुद का दुखता पैर लिए देख रही थी
उस घुलन को
थोडी देर के लिए ही क्यों न हो
शहर को बाँटने वाली वो लकीर
मिट गई थी
उसे अच्छा लगाँ

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