Friday, September 28, 2018

उलझी बेल

मन बडा कच्चा
मृत्यू सब से सच्चा
ये जानकर भी हात से
खिलौना ना छुटे

मन बच्चेसा भागे
हातों कायनात माँगे
साधी रेत ना पकडी जाए
अौर अश्कों के समंदर बहाए

मन गिरहों का बाजार
सोचें किस से करता मै सच्चा प्यार
ये गिरह सुलझाने की कोशिश
बना दे नयी गिरहे हजार

मन भोला मन छोटा
इतनीसी मिट्टी का लोटा
पुरा भरने से खुश होता
पर अंजान ठिपकती बूँदो से

ये दुनियादारी ना समझा
ना समझा जीवन-मृत्यू का खेल
जिंदगी नक्षेदारी वक्त की
अौर ये उस नक्षेदारी मे उलझी बेल

No comments:

Post a Comment