Monday, September 24, 2018

ए सअादत!

तू ना रहा ये सही हुअा
बेशक तेरी कमी है मगर
दुनिया की जिल्लत से तू बच गया
ये सही हुअा

तेरे कलम उठाने की मजबूरी
शायद समझ सकता हूँ मै
वो तडप तेरी
वो कशीश तेरी
तेरे हर लफ्ज के किनारे टहलनेवाली
घुटन तेरी
चिंखें भी तो थी
उस हर इक पन्ने मे दबी हुई
काश वो उसे सुन सकते
काश हम भी उन्हें सुन सकते...
हम सदीयोंसे ऐसे ही है
बहरे, अंधे
बाहर से जलते
अौर अंदर से बुझे हुए

जब अहिंसा की अावाज देनेवाला
चिता पर लेट गया
जब देश को अाजाद करने की चाह मे
कोई बोस इतिहास मे खो गया
जब ऐसी कई अावाजे हमसे मायूस होकर
कायनात से जा मिली
तब कहीं जाकर हमे थोडासा एहसास हुअा
के भाई,
''शायद ये बंदा कुछ ठिक कह रहा था''
हम अक्सर बडी देर से होश मे अाते है...

तू जब था तब भी
जब तू न था तब भी
तेरे ठंडे गोश्त को नोंचनेवाले कम ना थे
पर तेरी कलम ना झुकी
तेरी अावाज ना बदी
कितना अच्छा हुअा के
हम लोगो मे उस वक्त वो ताकद ना थी
जो तेरी अावाज को दफना दे

पर तेरे अफसाने पढ़ते हुए
अाज कुछ डर सा लगता है
कहीं तेरी अाग से जला हुअा कोई टुकडा
दुनिया मे फिर से अाग लगाने की कोशिश ना करे
क्योंकी उस वक्त तुझ पर मुकद्दमे दायर करनेवाले
अाज हाथों मे चाकू लेकर सडकों पर घूम रहे है
ए सअादत! तू ना रहा वोही अच्छा है
अगर होता तो अाज मिटा दिया गया होता
जैसे हमने खुद के भीतर के इन्सान को

चुन चुन के मिटा दिया है...

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