ये दूरी भी कितनी अजि़ब है?हम ख़फ़ा हो जाते हैतुम्हारी किसी बात परहम तुम्हें बता नहीं पातें,तुम हमे देख़ नहीं पातेहम समझा नहीं पातेंतुम समझ नहीं पातें,खुद ही रुठना हैखुद ही खुद को मनाना हैये दुरीया जो अकेलापन ले कर आती है?क्या वो यहीं है?
No comments:
Post a Comment