Tuesday, December 26, 2023

चप्पल

हर रोज सुबह उठने के बाद
मै चप्पल पहन लेता हूँ
फिर भी,
दिनभर काम करते करते
पाँव मे बार बार कुछ चुभता रहता है
ऑफिस की सिढीयाँ कई बार चढ-उतरता हूँ
तब तकलिफ नहीं होती
पण शांती से बैठते ही
फिर कुछ चुभने लगता है
तब तुम्हारी याद आती है
गहरी...
कभी लिखता हूँ,
कभी किसी को पढ के सुनाता हूँ
चुभन वैसे के वैसी रहती है
शाम होती है
घर लौट आता हूँ
जुते उतार कर कोने मे रखता हूँ
रात होते होते तुम्हारी याद गाढी होती जाती है
अब चुभन दिल तक सुनाई देती है
रात को सो जाता हूँ
निंद मे भी चप्पल पैरो से नही निकलती...
मुझे पता है मै दूर हूँ तुम से
पर मै महसूस करता हूँ
तुम्हे, तुम्हारी पिडा को, इस अंतर को भी
किसी बोझ के तले दबे हुए सपने आते है
आँख खुलते ही तुम याद आते हो
मै उठता हूँ
हर रोज की तरह मै
फिर तुम्हारी चप्पल पहन लेता हूँ...

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