धुंदला धुंदला सा इक दर्द
लिपटा हुआ तेरे हर खयाल से
उभरता रहता है बार बार
मेरे दिल-ओ-दिमाग मे
तेरे मिलने-ना मिलने के बीच
तेरे कुछ कहने - ना कहने के बीच
ये जो फैली हुई तनहाई है
उसे कुरेदता
दिल का बोझ बढाता
मेरी साँस मध्यम करता हुआ
ये दर्द कभी उभरता, कभी उमडता है
तेरे हर खयाल की आड मे
बेवजह ही बन जाता है
मेरे बेचैनी की वजह
और छिड जाती है
दिल की तार कोई
जो बांधे-समेटे हुई है
मेरे कई अनचाहे खयालों को
धडकन परेशान
भागी भागी टहलती रहती है
और गहरा होने लगता है तेरा इंतेजार
मेरी सहमी सी आँखो मे
कैसे बताऊ
तेरे बगैर यूँ चलते हुए
हर पल यू लगता है
के मै जी रहा हूँ मेरी आधी जिंदगी
और मेरी आधी साँस
गिरवी पडी हो कही...

No comments:
Post a Comment